देश का पहला प्रयोग: गड़चिरोली के गोंडवाना विवि में शुरू हुआ 'वैद्य चिकित्सालय', 20 से 50 रुपये में परंपरागत इल

Gondwana University News: गड़चिरोली के गोंडवाना विश्वविद्यालय में देश का पहला 'वैद्य चिकित्सालय' शुरू। आदिवासी वैदुओं को औपचारिक मान्यता, 20-50 रुपये में मिल रहा परंपरागत उपचार।
Gondwana University Gadchiroli Vaidya Chikitsalay
गड़चिरोली वैद्य चिकित्सालय (सोर्स- फोटो नवभारत)
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Gondwana University Gadchiroli Vaidya Chikitsalay: गड़चिरोली के गोंडवाना विश्वविद्यालय ने आम बीमारियों के इलाज के लिए स्थानीय वैद्यों (पारंपरिक चिकित्सकों) के सहयोग से एक 'वैद्य चिकित्सालय' की शुरुआत की है। इस तरह का यह देश का पहला ही अनूठा प्रयोग है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की प्रेरणा से और कुलगुरु डॉ. प्रशांत बोकारे के नेतृत्व में विश्वविद्यालय ने यह अभिनव उपक्रम शुरू किया है।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने पूर्व में यह अपेक्षा व्यक्त की थी कि विश्वविद्यालय को स्थानीय लोगों के व्यापक हित की दृष्टि से विभिन्न जनकल्याणकारी उपक्रम चलाने चाहिए। इसी से प्रेरणा लेते हुए, क्षेत्र के पारंपरिक चिकित्सा का ज्ञान रखने वाले वैद्यों की सेवाओं को प्रमाणित करने, उन्हें वित्तीय लाभ पहुंचाने तथा जरूरतमंद मरीजों को उनके इस पारंपरिक ज्ञान का लाभ दिलाने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय ने विवि परिसर में ही यह वैद्य चिकित्सालय शुरू किया है।

विश्वविद्यालय के 'साइंस एंड टेक्नोलॉजी रिसोर्स सेंटर' (STRC) को इस केंद्र की मुख्य जिम्मेदारी सौंपी गई है, जिसके माध्यम से पारंपरिक आदिवासी औषधीय ज्ञान तथा आधुनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली का बेहतरीन समन्वय किया गया है। वर्तमान में स्वप्निल गिरडे एसटीआरसी के प्रमुख हैं।

दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी बांधवों के लिए ये वैद्य सैकड़ों वर्षों से प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करा रहे हैं, लेकिन इन्हें कभी कोई औपचारिक मान्यता नहीं मिली थी। अब विश्वविद्यालय की ओर से इन पारंपरिक चिकित्सकों को संस्थागत मान्यता और प्रमाणपत्र दिया जा रहा है।

नक्सल प्रभावित क्षेत्र के रूप में पहचानी जाने वाली गड़चिरोली की इस छवि को बदलने के लिए सरकार निरंतर प्रयास कर रही है। इस वनव्याप्त जिले में गोंड, माडिया, पारधी जैसी आदिवासी जनजातियां कई सदियों से निवास कर रही हैं। यह पूरा समुदाय प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पूरी तरह से पारंपरिक वैद्यकीय पद्धति पर ही निर्भर था। इन वैद्यों के पास स्वास्थ्य सेवा का लंबा अनुभव और दुर्लभ औषधीय वनस्पतियों का गहरा ज्ञान है।

चूंकि आदिवासी क्षेत्रों के युवा अब धीरे-धीरे शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं और दुर्गम ग्रामीण अंचलों में एलोपैथिक चिकित्सक आसानी से उपलब्ध नहीं होते, वहां आज भी यही वैद्य स्वास्थ्य सेवाओं की आपूर्ति करते हैं। इसी जमीनी हकीकत को पहचानकर कुलगुरु ने इस पारंपरिक ज्ञान का जतन करने तथा ग्रामीण स्वास्थ्य में सुधार लाने के लिए इन पारंपरिक वैद्यों को औपचारिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में शामिल करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया और इसे अमलीजामा पहनाया।

14 चिकित्सक दे रहे हैं सेवाएं

औषधीय वनस्पतियों के विशेषज्ञों (वनस्पतिशास्त्रियों) तथा प्राकृतिक चिकित्सकों (निसर्गोपचार विशेषज्ञों) की मदद से इन पारंपरिक उपचार पद्धतियों का वैज्ञानिक प्रमाणीकरण (वैलिडेशन) किया गया है। इसके दूसरे चरण में इस वैद्य चिकित्सालय की शुरुआत की गई। वर्तमान में 14 चिकित्सक यहां अपनी सेवाएं दे रहे हैं, जबकि 50 से अधिक वैद्य अपने-अपने गांवों में सामाजिक मान्यता और सम्मान के साथ आजीविका कमाते हुए सेवा दे रहे हैं। इससे पूर्व उन्हें ऐसी कोई आधिकारिक मान्यता प्राप्त नहीं थी। इस अस्पताल के बाह्य मरीज विभाग (OPD) में मात्र 20 से 50 रुपये की बेहद कम फीस में मरीजों का उपचार किया जाता है।

विवि ने दिलाया समाज में सम्मान: रामभाई राउत

वैद्य चिकित्सालय चिकित्सक रामभाई ललाई राउत ने कहा है कि "पीढ़ी-दर-पीढ़ी से चल रही यह वैद्यकीय उपचार की एक समृद्ध परंपरा है, लेकिन वैज्ञानिक प्रमाणीकरण न होने के चलते अब तक वैद्यों के हिस्से में केवल उपेक्षा और अपमान ही आया था। लेकिन अब विश्वविद्यालय के इस प्रयास से स्थिति पूरी तरह बदल गई है। विश्वविद्यालय ने हमारे पारंपरिक वैद्यकीय ज्ञान को समाज में एक बड़ा सम्मान दिलाया है।"

शुरू हुई सुदृढ़ प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा: डॉ. बोकारे

गोंडवाना विश्वविद्यालय कुलगुरु डॉ. प्रशांत बोकारे ने कहा है कि "यह वैद्य चिकित्सालय केवल एक स्वास्थ्य सेवा केंद्र नहीं है, बल्कि यह इस क्षेत्र का सामाजिक-सांस्कृतिक पुनरुज्जीवन है। इसके माध्यम से सालों से चले आ रहे औषधीय वनस्पतियों के ज्ञान का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण (डॉक्यूमेंटेशन) करना संभव हुआ है। चिकित्सा क्षेत्र की इस पारंपरिक और आधुनिक ज्ञान शाखा का यह एक बेहतरीन मेल है।"

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