नक्सली और पुलिस में क्या फर्क? पूर्व नक्सल कमांडर मवाड़ी ने की लोकाशाही की वकालत, तो दर्ज हो गया केस

Niringsay Gopi Madavi Gadchiroli: गड़चिरोली जिले में बंदूक छोड़ संविधान थामने वाले पूर्व नक्सल कमांडर गोपी मड़ावी के आंदोलन पर पुलिस केस। मड़ावी ने पूछा- 'नक्सली और पुलिस में क्या फर्क है?'
Former Naxal commander Niringsay alias Gopi Madavi joins democratic protest in Gadchiroli.
पूर्व नक्सल कमांडर निरिंगसाय उर्फ गोपी मड़ावी (सौजन्य-नवभारत)
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Naxal Ideology vs Development: गड़चिरोली जिले में एक दशक पहले दंडकारण्य में बंदूक की नोक पर बदलाव लाने की मानसिकता रखनेवाले नक्सल कमांडर निरिंगसाय उर्फ गोपी मड़ावी ने अंतत: संविधान थामकर मुख्य प्रवाह से जुड़ने का मन बनाया। अपनी आपबीती में निरिंगसाय ने बताया कि 13 जनवरी को सरकार का ध्यानाकर्षण कराने के लिए शांतिपूर्ण मार्ग से नपं कार्यालय पर ताला ठोको आंदोलन किया।

इस समय पुलिस का तगड़ा बंदोबस्त होते हुए भी पुलिस ने उन्हें रोका नहीं। विशेष बात यह है कि घटनास्थल पर मौजूद गड़चिरोली पुलिस संपूर्ण घटना को कैमरे में कैद करने में व्यस्त रही। संपूर्ण घटनाक्रम पुलिस के समक्ष होने के बाद भी कुछ ही आंदोलनकर्ताओं के खिलाफ सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाने का कारण बताकर मामला दर्ज किया है।

2014 में छोड़ा नक्सल आंदोलन

लोकशाही मार्ग से शुरू इस आंदोलन में सामाजिक व राजनीतिक दल से संबंधित आंदोलनकर्ताओं का प्रमुखता से समावेश था। इसमें वर्ष 2014 में नक्सल आंदोलन छोड़ मुख्यधारा में शामिल हुए आत्मसमर्पित नक्सल कमांडर निरिंगसाय उर्फ गोपी मड़ावी का भी समावेश था।

नगर पंचायत की वित्तीय अनियमितता व अफलातून कामकाज समेत बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए निरिंगसाय उर्फ गोपी मड़ावी लोकहितार्थ वैधानिक आंदोलन में शामिल हुआ था। लेकिन आंदोलनकर्ताओं पर ही मामला दर्ज किया गया है।

प्रत्यक्ष में आंदोलनकारी व नपं के कर्मचारियों की शिकायत जांच में रख निष्पक्ष व पारदर्शी जांच शुरू कर सकते थे। लेकिन ऐसा न करते हुए एकतरफा मामला दर्ज किया गया है। कोरची पुलिस के इस अजब भूमिका से फिर नक्सली ओर पुलिस में क्या फर्क है? ऐसा सवाल उपस्थित कर आत्मसमर्पित नक्सली मड़ावी ने अनेकों को सोचने पर मजबूर किया है।

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