Chhatrapati Shivaji Maharaj: क्या हुआ…जब सेनापति ने ईनाम के तौर पर छत्रपति शिवाजी महाराज को भेंट की मुगल सुंदरी?
Chhatrapati Shivaji Maharaj Birth Anniversary: छत्रपति शिवाजी महाराज जितने तलवार के धनी थे, उतने ही चरित्र के भी धनी थे। उन्होंने अपने चरित्र और तलवार को कभी दागदार नहीं होने दिया।
- Written By: अभिषेक सिंह
छत्रपति शिवाजी महाराज (सोर्स- सोशल मीडिया)
Chhatrapati Shivaji Maharaj Birth Anniversary: छत्रपति शिवाजी महाराज अपनी देशभक्ति, वीरता और युद्धकौशल के लिए भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों में युगों-युगों तक के लिए अमर हैं। लेकिन शिवाजी की और ख़ूबी यह थी कि वह दुश्मन के किले ही नहीं बल्कि उनका दिल तक भी जीत लेते थे। आज हम आपके लिए ऐसी ही एक कहानी लेकर आए हैं।
छत्रपति शिवाजी महाराज जितने तलवार के धनी थे, उतने ही चरित्र के भी धनी थे। उन्होंने अपने चरित्र और तलवार को कभी दागदार नहीं होने दिया। एक बार शिवाजी के वीर सेनापति ने कल्याण का किला जीत लिया। हथियारों के भंडार के साथ-साथ उसे अपार धन-संपत्ति भी प्राप्त हुई। इस दौरान एक सैनिक ने मुगल किले के सेनापति की पुत्रवधू को, जो दिखने में अत्यंत सुंदर थी, उनके सामने प्रस्तुत किया।
सेनापति उस युवती की सुंदरता पर मोहित हो गया। सेनापति ने उस युवती को शिवाजी महाराज को उपहार स्वरूप भेंट करने का निर्णय लिया। सेनापति ने उस युवती को पालकी में बैठाया और शिवाजी महाराज के दरबार में पहुंच गया। शिवाजी उस समय अपने सेनापतियों के साथ शासन-व्यवस्था के विषय में चर्चा कर रहे थे।
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युद्ध में विजयी सेनापति ने शिवाजी को प्रणाम किया और कहा कि महाराज, मैं आपको कल्याण से जीती हुई एक वस्तु भेंट करना चाहता हूं। यह कहकर उसने एक पालकी की ओर इशारा किया। जैसे ही शिवाजी ने पालकी का पर्दा उठाया, तो उन्होंने देखा कि उसमें एक सुंदर मुगल युवती बैठी हुई है। शिवाजी महाराज ने शर्म से सिर झुका लिया और कहा, ‘काश हमारी मां इतनी सुंदर होती, तो मैं भी सुंदर होता।’
इसके बाद उन्होंने अपने सेनापति को डांटते हुए कहा, ‘तुम मेरे साथ रहकर भी मेरे स्वभाव को नहीं समझ सके। शिवाजी दूसरों की मां-बेटियों को अपनी मां के समान मानते हैं। अब उसे उसकी मां के पास सम्मान के साथ छोड़ दो और वापस आ जाओ।’ सेनापति शिवाजी के व्यवहार से काफी हैरान था।
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वह सोच रहा था कि वह पुरस्कार का हकदार है और उसे केवल फटकार मिली है। लेकिन मुगल सूबेदार की बहू को उसके घर भेजने के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं था। उसने मन ही मन शिवाजी महाराज के चरित्र को पहचान लिया और मुगल शिविर से उस महिला को उसके शिविर में भेज दिया। इस वाकये को लेकर वह मुगल नवयुवती भी छत्रपति शिवाजी महाराज को सलाम करने पर मजबूर हो गई।
