Chandrapur District: चंद्रपुर जिले समेत पूर्व विदर्भ के चार जिलों को झाड़ीपट्टी कहा जाता है। इस झाड़ीपट्टी की एक विशिष्ट बोली भाषा भी है। यह भाषा समय के साथ लुप्त होती जा रही है। इस बोली भाषा के जतन हेतु सरकार की ओर से कोई प्रयास नहीं है। यह यहां की संस्कृति की पहचान है। इसलिए इसका संवर्धन भी हमारी जिम्मेदारी है, इस प्रतिबद्धता को लेकर यहां ब्रम्हपुरी झाड़ी बोली शाखा ने बोली जागर उपक्रम की घोषणा की है।
इस घोषणा के तहत 90 दिन 90 विषय लेकर बोली भाषा के संवर्धन का प्रयास किया जाएगा। ब्रम्हपुरी में झाड़ीबोली साहित्य मंडल सक्रिय है। बोली भाषा से जुडे साहित्यिक कार्यक्रम, व्याख्यान, कवि सम्मेलन, किताब प्रकाशन जैसे कई उपक्रम इसके माध्यम से लिए जा रहे है।
इस मंडल का कहना है कि संपूर्ण महाराष्ट्र में ही विविध बोली भाषाओं का संवर्धन व जतन होना चाहिए। इसी उद्देश्य को लेकर ब्रह्मपुरी झाड़ी बोली शाखा ने महाराष्ट्र की झाड़ी बोली वहाडी, नागपुरी, खानदेशी, कोकणी, मालवणी ऐसी विविध बोली भाषाओं में नब्बे दिन नब्बे विषय लेकर अनूठा उपक्रम शुरू किया है।
महाराष्ट्र में अनेक जगहों पर मौखिक स्वरूप में बड़े पैमाने पर बोली साहित्य बिखरा पड़ा है। उसका संकलन करना, यह उद्देश्य भी इस उपक्रम के पीछे है। संपूर्ण बोलीजागर कार्यक्रम ब्रम्हपुरी शाखा के माध्यम से हाथ लिया गया है।
शाखा प्रमुख कवि संतोष मेश्राम ने बताया कि बोली भाषा किसी भी प्रदेश की विशेष पहचान व संस्कृति का हिस्सा होती है। यह परंपराओं के साथ ज्ञान का प्रचारप्रसार भी करती है। समय के साथ प्रमाण भाषा के कारण इस ओर अनदेखी हुई।
जिससे एक प्राचीन भाषा से नई पीढ़ी वंचित रह जाने का खतरा मंडरा रहा है। क्योंकि बोली परंपरा से विकसित व वृध्दिंगत होती रही है। इसलिए हमने यह उपक्रम हाथ लिया है। झाड़ीबोली की अपनी परंपरा व इतिहास रहा है। जिसे पूर्व विदर्भ ने अब तक संजोए रखा है।
मील का पत्थर साबित होगा मेश्राम इस कार्यक्रम के लिए झाड़ीबोली साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष, कवि, स्तंभलेखक डॉ. धनराज खानोरकर, लेखक व कवि, झाड़ीबोली जिलाध्यक्ष अरुण झगडकर, कवि व गड़चिरोली जिल्हाध्यक्ष प्रा. विनायक धानोरकर, कवि मुरलीधर खोटेले बतौर सलाहकार योगदान दे रहे है।
कवि धनंजय पोटे, गड़चिरोली की किरण चौधरी, गायत्री गुरव, अमरावती की वृषाली चोरे, योगिता निपाने, नाशिक के अनिकेत सागर समूह प्रशासक के रूप में इसमें अपना अहम योगदान दे रहे है। संपूर्ण बोली में विविध विषय देकर उस बोली साहित्यकारों को लिखने के लिए प्रेरित करना व बोली के अध्ययन को गति दिलाना इसमें यह उपक्रम मील का पत्थर साबित होगा, ऐसा दावा ब्रम्हपुरी शाखा प्रमुख संतोष मेश्राम ने किया है।
आज भी है बोलियों का महत्व राज्य में अहिराणी बोली की महान कवयित्री बहिणाबाई चौधरी का योगदान माना जाता है। जलगांव प्रांत में आज भी इसे बोला जाता है। इसके अलावा कोली लोगों की बोली, मालवणी, कोकणी बोलिया अपना अस्तित्व बनाए हुए है। ऐसे में झाड़ीपट्टी की झाड़ी बोली को भी विकसित करना, बढ़ावा देना, नई पीढ़ी में इसे प्रचलित करना, पाठयक्रम का हिस्सा बनाना जरूरी बताया जा रहा है।