1000 करोड़ की जरूरत, पर बजट नहीं, भंडारा के गोसीखुर्द से 42 गांवों का पुनर्वास अब भी अधर में

Gosikhurd Rehabilitation Project: गोसीखुर्द परियोजना से प्रभावित 42 गांवों के पुनर्वास का मुद्दा फिर गरमाया। शीतसत्र में मिले आश्वासन के 6 माह बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं, ग्रामीणों में भारी नाराजगी।
Gosikhurd Project 42 Villages Rehabilitation Pending
अधर पुनर्वास (सोर्स - फोटो नवभारत)
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Gosikhurd Project 42 Villages Rehabilitation Pending: गोसीखुर्द परियोजना (इंदिरा सागर) से प्रभावित 42 गांवों के पुनर्वास का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। छह माह पहले मिले सरकारी आश्वासन के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने से ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ गई है। उन्होंने आगामी मानसून सत्र में सरकार से इस पर जवाब देने की मांग तेज कर दी है।

सत्र में मिला था आश्वासन, पर जमीन पर कोई प्रगति नहीं

शीतकालीन सत्र के दौरान विधायक डॉ. परिणय फुके ने विधान परिषद में यह मुद्दा उठाया था। उस समय जलसंसाधन मंत्री गिरीश महाजन ने प्रभावित गांवों का स्वतंत्र सर्वेक्षण कराकर पुनर्वास पर सकारात्मक निर्णय लेने का आश्वासन दिया था। हालांकि, छह महीने बीत जाने के बाद भी इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है, जिससे ग्रामीणों में असंतोष गहराता जा रहा है।

बैकवॉटर से प्रभावित गांवों की जटिल स्थिति

गोसीखुर्द परियोजना के बैकवॉटर (भराव के पीछे का पानी) से प्रभावित 42 गांव आज भी प्रशासनिक उलझनों के बीच फंसे हुए हैं। इन्हें कहीं 'परियोजना प्रभावित' तो कहीं 'बाढ़ प्रभावित' श्रेणी में डाल दिया जाता है। इसी तकनीकी भ्रम के कारण पुनर्वास की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि सरकारी फाइलों में तो प्रक्रिया चलती रहती है, लेकिन जमीन पर कोई बदलाव दिखाई नहीं देता।

पुनर्वास के लिए लगभग 1,000 करोड़ रुपये की जरूरत

विधायक डॉ. परिणय फुके ने सत्र में बताया था कि शेष प्रभावित गांवों के पूर्ण पुनर्वास के लिए लगभग 1,000 करोड़ रुपये के बजट की आवश्यकता होगी। उन्होंने कारधा, दवडीपार और खमारी जैसे गांवों के तत्काल पुनर्वास की मांग भी प्रमुखता से रखी थी। लेकिन अब तक बजट आवंटन या योजना के स्तर पर कोई स्पष्ट प्रगति सामने नहीं आई है।

ग्रामीणों की बढ़ती समस्याएं और पलायन

प्रभावित गांवों में रहने वाले लोगों को कई गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। जमीन से पानी रिसने के कारण घरों में सालभर नमी बनी रहती है, दीवारों में दरारें आ रही हैं और फंगस (बुरशी) फैल रही है। इसके अलावा सांपों और बिच्छुओं का खतरा भी बहुत बढ़ गया है। हर वर्ष बरसात के दौरान कई परिवारों को अस्थायी रूप से सुरक्षित स्थानों पर पलायन करना पड़ता है, जिससे उनका जीवन और भी अधिक कष्टप्रद हो गया है।

गोसीखुर्द संघर्ष समिति ने जताई भारी नाराजगी

गोसीखुर्द संघर्ष समिति के अध्यक्ष भाऊ कातोरे का कहना है कि बांध भरने के बाद गांवों में पानी का प्रवेश करना केवल सामान्य बाढ़ नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर बैकवॉटर समस्या है। उनका कहना है कि जो गांव वर्षों से पूरी तरह सुरक्षित थे, वे अब बांध के कारण पुनर्वास की मांग करने को मजबूर हैं। समिति और प्रभावित ग्रामीणों ने सरकार से शीघ्र ठोस निर्णय लेकर पुनर्वास प्रक्रिया को अमलीजामा पहनाने की मांग की है।

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