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मोहाड़ी के भोसा गांव में मानवीय संवेदनाओं का अपमान: 70 साल बाद भी श्मशान नहीं, 4 किमी पैदल मजबूर ग्रामीण

Bhandara News: भोसा गांव के ग्रामीण 34 किमी पैदल चलकर अंतिम संस्कार करने को मजबूर हैं। श्मशानभूमि की अनुपस्थिति में उनकी मानवीय संवेदनाओं का मजाक बन रहा है। प्रशासन की निष्क्रियता पर सवाल उठते हैं।

  • Author By Raghwendra Tiwari | published By रूपम सिंह |
Updated On: Apr 28, 2026 | 07:39 PM
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Maharashtra Rural Issues: आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी मोहाडी तहसील के भोसा गांव को अब तक अपनी श्मशानभूमि नहीं मिल पाई है। गांव में किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर अंतिम संस्कार के लिए ग्रामीणों को 3 से 4 किलोमीटर दूर सूर नदी के किनारे जाना पड़ता है। गांव के लोगों का कहना है कि यह स्थिति केवल असुविधा नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के साथ मजाक है। किसी परिवार पर दुख का पहाड़ टूटने के समय शव को कंधे पर उठाकर कई किलोमीटर पैदल ले जाना शारीरिक और मानसिक रूप से बेहद कष्टदायक होता है।

खासकर बुजुर्गों और महिलाओं को इस दौरान भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। श्मशान के लिए निर्धारित स्थान न होने के कारण नदी किनारे खुले में, धूप और बारिश के बीच अंतिम संस्कार करना पड़ता है। बरसात के मौसम में यह समस्या और गंभीर हो जाती है। सूर नदी तक जाने वाला रास्ता कच्चा और कीचड़ भरा होने के कारण चलना भी मुश्किल हो जाता है।

ऐसे में अंतिम यात्रा निकालना किसी चुनौती से कम नहीं होता। बारिश में भीगते हुए और कीचड़ से जूझते हुए ग्रामीण अंतिम संस्कार करने को मजबूर हैं। वहां किसी प्रकार का शेड का भी उपलब्ध नहीं है।

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आश्वासन बहुत, कार्रवाई शून्य

आश्वासन बहुत, कार्रवाई शून्यग्रामीणों ने कई बार प्रशासन और संबंधित अधिकारियों से श्मशानभूमि के लिए जमीन उपलब्ध कराने की मांग की है। जनप्रतिनिधियों ने भी चुनाव के समय आश्वासन दिए, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

बारबार प्रयासों के बावजूद केवल आश्वासन ही मिल रहे हैं, जिससे ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन की निष्क्रियता के कारण वे अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित हैं। मृतकों के सम्मान के लिए कम से कम एक श्मशानभूमि भी उपलब्ध न कराना व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

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Published On: Apr 28, 2026 | 06:49 PM

Topics:  

  • Bhandara News
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