MNREGA में पर्याप्त काम नहीं, केवल 7,744 मजदूरों को मिला रोजगार, शासन की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

MNREGA Update: भंडारा जिले में मनरेगा के पर्याप्त कार्य अभी तक शुरू नहीं हुए। केवल 7,744 मजदूरों को रोजगार मिला, प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल।
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मनरेगा (सौजन्य-सोशल मीडिया)
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Rural Development: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरों को वर्ष में 100 दिनों का रोजगार उपलब्ध कराना है। इस योजना के अंतर्गत 50 प्रतिशत कार्य ग्राम पंचायत स्तर पर किए जाते हैं, लेकिन भंडारा जिले में स्थिति चिंताजनक है। दीपावली के बाद एक माह से अधिक समय बीत चुका है, फिर भी जिले में अभी तक पर्याप्त कार्य प्रारंभ नहीं हो सके हैं।

वर्तमान में पूरे जिले में सिर्फ 7,744 मजदूरों को ही रोजगार उपलब्ध कराया जा सका है, जो मनरेगा के उद्देश्य के बिल्कुल विपरीत है और शासन-प्रशासन की गंभीर लापरवाही को उजागर करता है। जानकारी के अनुसार, इस वर्ष भारी बारिश के बाद 24 नवंबर 2025 तक पूरे जिले में केवल 1,801 मनरेगा कार्य प्रारंभ किए गए हैं। इन कार्यों का वर्गीकरण देखें तो स्थिति और अधिक चिंताजनक नजर आती है।

इन कार्यों में रोजगार

वृक्ष संगोपन के केवल 23 कार्य शुरू है। इन कार्यों पर सिर्फ 138 मजदूर रोजगार प्राप्त कर सके हैं। इससे साफ होता है कि पर्यावरण संरक्षण के महत्वपूर्ण माने जाने वाले पौधारोपण-संगोपन जैसी गतिविधियों पर बहुत कम ध्यान दिया गया है। घरकुल से संबंधित 1,775 कार्य शुरू है। इन पर 7,556 मजदूर कार्यरत हैं। घरकुल निर्माण ग्रामीण विकास का अहम हिस्सा है, लेकिन यह अकेला कार्य पूरे जिले की मनरेगा जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता। इन दोनों श्रेणियों को मिलाकर 1,801 कार्यों पर कुल 7,744 मजदूरों को रोजगार मिला है। लेकिन यह संख्या जिले के वास्तविक श्रमबल के मुकाबले बेहद कम मानी जा रही है।

दर्जनों मनरेगा कार्य उपलब्ध, अवसर शून्य

मनरेगा के अंतर्गत ग्राम पंचायत स्तर पर निम्न प्रकार के कार्य शामिल होते हैं, जिनसे बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर उत्पन्न किए जा सकते हैं। जैसे शौचालय निर्माण, मुरुम सड़क, सीमेंट सड़क व सीमेंट नाली निर्माण, तालाबों की मिट्टी खुदाई, गहराईकरण व मरम्मत, नहरों का रख-रखाव व नाला सरलीकरण, कुओं का पुनर्भरण और सिंचाई कुओं का निर्माण, मत्स्य पालन के लिए तालाब निर्माण शामिल है।

इसके अलावा केंचुआ खाद (वर्मी कम्पोस्ट) व नाडेप गड्ढे, मोक्षधाम सौंदर्यीकरण, शोषण गड्ढे (सोख्ता), खेल व मैदान समतलीकरण, पशु शेड-बकरी/मेंढ़ा/पशुधन शेड, मुर्गी पालन यूनिट, पैदल मार्ग (कच्ची सड़क) और कच्ची नालियां शामिल है। लेकिन चिंताजनक तथ्य यह है कि इनमें से किसी भी प्रकार के कार्य पर एक भी मजदूर को रोजगार नहीं दिया गया है। यह स्थिति ग्रामीण विकास कार्यों में स्पष्ट ठहराव और योजना के खराब क्रियान्वयन को उजागर करती है।

ग्रामीण मजदूरों की बढ़ रही परेशानी

दीपावली के बाद से ग्रामीण मजदूरों को काम की उम्मीद थी, लेकिन कार्य शुरू न होने से उनकी आर्थिक स्थिति और खराब होती जा रही है। मनरेगा मजदूरों का कहना है कि खेतों में मौसमी रोजगार बरसात के बाद समाप्त हो चुका है, निजी श्रमिक कार्य सीमित हैं और मनरेगा ही एकमात्र भरोसा है।

ऐसे में काम की कमी ने ग्रामीण परिवारों को संकट की ओर धकेल दिया है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो मनरेगा का उद्देश्य ही अधूरा रह जाएगा और हजारों ग्रामीण परिवारों की आजीविका पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।

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