भंडारा में खतरे में 'प्रकृति का संतुलन'; कंक्रीट के जंगल और सूखते जलस्रोतों ने बढ़ाई जिले की तपन

भंडारा जिला, जो कभी हरियाली और जलस्रोतों के लिए जाना जाता था, अब भीषण गर्मी और पर्यावरणीय असंतुलन का सामना कर रहा है। तेजी से घटती हरियाली और सूखते जलस्रोत भविष्य के लिए चिंता का विषय हैं।
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Bhandara Environment Global Warming: भंडारा कभी घने जंगलों, नदियों और तालाबों के लिए पहचाने जाने वाला भंडारा जिला अब भीषण गर्मी और पर्यावरणीय असंतुलन की मार झेल रहा है। तेजी से घटती हरियाली, सूखते जलस्रोत और बढ़ता तापमान भविष्य के लिए चेतावनी बनकर उभरे हैं।

बिगड़ा प्राकृतिक संतुलन राजपूतफ़ोटो Shailendra Rajpootवाइल्ड वाच फाउंडेशन के सचिव शैलेन्द्र सिंह राजपूत के अनुसार, शहरीकरण और कांक्रीट निर्माण ने प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ दिया है। सड़कों के विस्तार और बाजारों के विकास के कारण बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई हुई है। सदाबहार वृक्षों की जगह सजावटी पौधों ने ले ली है, जो पर्याप्त छाया नहीं देते। पहले मिट्टी के घरों से ठंडक मिलती थी, लेकिन अब सीमेंट के निर्माण से गर्मी बढ़ रही है।

उन्होंने कहा कि वसुंधरा दिवस तभी सार्थक होगा जब हर नागरिक पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी निभाएगा। सुख रहे जल स्त्रोत खानफ़ोटो Shahid Khanसेव एकोसिस्टम एंड टाइगर के शाहिद खान ने बताया कि जिले में जलस्रोत तेजी से सूख रहे हैं। बोरवेल और कुओं से अत्यधिक जल दोहन के कारण भूजल स्तर गिर रहा है। पक्की सड़कों के कारण वर्षा जल जमीन में समाने के बजाय बह जाता है, जिससे जल पुनर्भरण प्रभावित हो रहा है। गर्मी की शुरुआत में ही तालाब सूखना चिंता का विषय है।

उन्होंने कहा कि वसुंधरा दिवस को केवल औपचारिकता न मानकर जनजागृति का माध्यम बनाना होगा। अवैध खनन से नुकसान शेखफ़ोटो Saeed Sheikhग्रीन हेरिटेज के सईद शेख के अनुसार, अवैध खनन से नदियों और पहाड़ियों को नुकसान पहुंच रहा है। रेत और पत्थरों के अत्यधिक उत्खनन से जलधारण क्षमता कम हो रही है, जिससे नदियां गर्मियों में सूखने लगी हैं। जिले में वायु प्रदूषण कम है, लेकिन जल प्रदूषण गंभीर समस्या बन चुका है।

घरेलू कचरे और रासायनिक उर्वरकों के कारण जलस्रोत दूषित हो रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।

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