

Maharashtra Bamboo Farming Profit: महाराष्ट्र के खेतों और जंगलों में इन दिनों एक बड़े आर्थिक और पर्यावरणीय बदलाव की नई पटकथा लिखी जा रही है। पारंपरिक रूप से कपास, सोयाबीन और गन्ने पर निर्भर रहने वाले सूबे के किसान अब बांस की खेती की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं। राज्य सरकार की नई औद्योगिक नीतियों और वैश्विक बाजार में 'ग्रीन गोल्ड' की बढ़ती मांग के चलते महाराष्ट्र देश में बांस उत्पादन का तीसरा सबसे बड़ा गढ़ बनकर उभरा है। आज विश्व बांस दिवस पर जानिए जानिए कैसे यह फसल ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तकदीर बदल रही है।
महाराष्ट्र में बांस का साम्राज्य मुख्य रूप से विदर्भ और कोंकण क्षेत्रों में फैला हुआ है। पूरे राज्य के कुल बांस उत्पादन का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अकेले विदर्भ से आता है। गड़चिरोली और चंद्रपुर के घने जंगलों में प्राकृतिक रूप से बांस का विशाल क्षेत्रफल है, जिसका प्रबंधन वन विभाग और स्थानीय जनजातीय समितियां करती हैं। वहीं दूसरी ओर, यवतमाल जिला कृषि स्तर पर व्यावसायिक रूप से बांस उगाने में पूरे महाराष्ट्र में पहले स्थान पर है।
कोंकण का सिंधुदुर्ग जिला अपनी विशिष्ट 'मंगा' प्रजाति के लिए जाना जाता है। बिना कांटों वाला यह सीधा और बेहद मजबूत बांस निर्माण कार्यों और बागवानी क्षेत्र की पहली पसंद बना हुआ है। विदर्भ और कोंकण के अलावा अब पश्चिम महाराष्ट्र के सातारा और मराठवाड़ा के सूखाग्रस्त इलाकों में भी किसान इसे अपना रहे हैं।
बांस का उपयोग अब केवल पारंपरिक टोकरी, चटाई या निर्माण कार्य के मचान तक सीमित नहीं रह गया है। राज्य की बांस उद्योग नीति 2025 ने इसके कमर्शियल उपयोग को नए पंख दिए हैं। सबसे बड़ा बदलाव ऊर्जा क्षेत्र में आया है। प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए महाराष्ट्र के सभी सरकारी और निजी थर्मल पावर प्लांट में 5% से 7% बांस आधारित बायोमास का कोयले के साथ मिश्रण अनिवार्य कर दिया गया है।
इसके अलावा, देश की बड़ी पेपर मिलों को कच्चे माल की आपूर्ति करने के साथ-साथ बायो-एथेनॉल और ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन में भी इसकी भारी मांग है। कपड़ा उद्योग में बांस के रेशों (फाइबर) से कपड़े बनाने और अगरबत्ती निर्माण में भी इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है।
कपास और सोयाबीन जैसी फसलों में जहां मौसम की बेरुखी और कीटों का भारी जोखिम रहता है, वहीं बांस एक ऐसी फसल है जिसे एक बार लगाने के बाद लगातार 40 से 50 वर्षों तक उपज ली जा सकती है। एक एकड़ में बांस लगाने की शुरुआती लागत करीब 40,000 से 1.5 लाख रुपये तक आती है। रोपाई के 3 से 4 साल बाद इसकी पहली कटाई शुरू हो जाती है, जिसके बाद किसान हर दूसरे साल प्रति एकड़ लाखों रुपये का शुद्ध मुनाफा कमाते हैं।
किसानों की इस राह को आसान बना रही है सरकार की अटल बांबू समृद्धि योजना। इसके तहत सरकार तीन वर्षों के दौरान अलग-अलग चरणों में प्रति पौधा 175 रुपये तक की वित्तीय सहायता (सब्सिडी) दे रही है। साथ ही, घने कांटों वाले बांसों की तेजी से कटाई के लिए अब मैन्युअल तरीकों की जगह आधुनिक चेन-सॉ मशीनों का उपयोग किया जा रहा है, जिससे श्रम लागत में भारी कमी आई है।
आर्थिक लाभ के साथ-साथ बांस पर्यावरण के लिए सुरक्षा कवच साबित हो रहा है। यह अन्य सामान्य पेड़ों की तुलना में 35% अधिक ऑक्सीजन छोड़ता है और भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है।
महाराष्ट्र सरकार अब इस व्यापक वृक्षारोपण के जरिए कार्बन क्रेडिट हासिल करने की दिशा में काम कर रही है, जिससे भविष्य में किसानों को पर्यावरण बचाने के बदले सीधे बैंक खातों में अतिरिक्त आमदनी मिल सकेगी। साफ है कि महाराष्ट्र में बांस की खेती सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि समृद्धि और पर्यावरण संरक्षण का एक नया ग्रीन रेवोल्यूशन बन चुकी है।
बांस उत्पादन और उसके क्षेत्रफल के मामले में महाराष्ट्र पूरे देश में तीसरे स्थान पर है। महाराष्ट्र में वर्तमान में लगभग 13.5 लाख हेक्टेयर (13,572 वर्ग किलोमीटर) भूमि बांस के दायरे में आती है। राज्य का वार्षिक उत्पादन लगभग 9.47 लाख टन है। बांस उत्पादन में देश में पहले स्थान पर मध्य प्रदेश आता है। वहीं अरुणाचल प्रदेश दूसरे नंबर पर आता है।