छत्रपति संभाजीनगर: ठेका अवधि खत्म होने को, नए टेंडर पर कोई आगे नहीं आया; छावनी परिषद के लिए बढ़ी परेशानी

Sambhajinagar Cantonment Market Tender: संभाजीनगर छावनी के गुरुवार बाजार के ठेके के लिए एक भी निविदा नहीं आई। बढ़ी राशि के चलते ठेकेदार दूर, परिषद के सामने राजस्व संकट गहराया।
Chhatrapati Sambhajinagar: Contract Tenure Nearing End, No Bidders Come Forward for New Tender; Troubles Mount for Cantonment Board
Sambhajinagar Bidders Issue( Source: Social Media )
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Chhatrapati Sambhajinagar Bidders Issue: छत्रपति संभाजीनगर छावनी क्षेत्र के बाजार के ठेके की अवधि अगले सप्ताह समाप्त होने जा रही है, लेकिन नए ठेके के लिए अब तक एक भी निविदा नहीं आने से छावनी परिषद के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई है।

परिषद ने इस बार ठेके की राशि बढ़ाकर 93 लाख रुपये कर दी थी, जिसके कारण ठेकेदारों ने दूरी बना ली है। शहर में जानवरों की खरीद फरोख्त के लिए सबसे बड़े बाजार के रूप प्रसिद्ध इस गुरूवार बाजार में ग्रामीण क्षेत्रों से व्यापारी व विक्रेता आते हैं, जो अपने रोजगार के लिए इसी पर निर्भर हैं।

छावनी परिषद के लिए भी यह आप का प्रमुख सोत बन गया है, क्योंकि सात टोल नाके पिछले चार वर्षों से बंद पड़े हैं। सूत्रों के अनुसार, चार बार निविदाएं जारी करने के बावजूद कोई भी ठेकेदार आगे नहीं आया।

ऐसे में परिषद को दोबारा निविदा प्रक्रिया शुरू करनी पड़ सकती है। वहीं, यह भी चर्चा है कि पूर्व ठेकेदार को ही अवधि बढ़ाकर काम सौंपने की तैयारी की जा रही है। जिस पर पहले मनमानी वसूली के आरोप लग चुके हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले इस बाजार का ठेका 86 लाख रुपये में एक वर्ष के लिए दिया गया था। गोलवाड़ी, पडेगांव, लिटिल फ्लावर चौक, अजंता भवन, गरमपानी रोड, बावा पंप व कर्णपुरा जैसे नाकों से पहले प्रतिदिन करीब 2.29 लाख रुपये की आय होती थी, जो सालाना लगभग 8.25 करोड़ रुपये तक पहुंचती थी।

नाके बंद होने से परिषद की आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई है। इसी बीच छावनी परिषद के मनपा में विलय की प्रक्रिया भी केंद्र स्तर पर अटकी हुई है।

मनमानी तरीके से वसूली करने की शिकायतें भी बढ़ीं

ठेकेदारों की ओर से दुकानदारों से मनमाने तरीके से वसूली करने की शिकायतें भी लगातार सामने आती रही है। ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले छोटे व्यापारी विवाद से बचने के लिए शिकायत दर्ज नहीं कराते, यदि करते भी है तो उस पर कार्रवाई नहीं होती।

ऐसे में वै चुपचाप व्यापार कर वापस लौट जाते हैं। वर्तमान में परिषद में 55 कार्यरत कर्मचारी व 84 सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं, इनके वेतन व पेंशन पर हर महीने 50 से 55 लाख रुपये खर्च होते हैं।

धनाभाव के चलते कई बार वेतन भुगतान में देरी भी हो रही है, जिससे कर्मचारियों में नाराजगी बढ़ रही है। परिषद के सामने अब दोहरी चुनौती है, एक और आय के सीमित स्त्रोंत व दूसरी और बाजार ठेके को लेकर अनिश्चितता, ऐसे में आने वाले दिनों में परिषद क्या निर्णय लेती है। इस पर सभी की नजरें टिकी है।

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