अदालत का अल्टीमेटम: 4 मई तक मांझा पीड़ितों को दें मुआवजा, वरना कलेक्टर भरेंगे अपनी जेब से जुर्माना!

Nylon Manja Compensation Maharashtra: बॉम्बे हाई कोर्ट ने नायलॉन मांझा से घायल पीड़ितों को 4 मई तक मुआवजा देने का आदेश दिया है। देरी होने पर जिलाधिकारियों को प्रतिदिन 1000 का व्यक्तिगत दंड देना होगा।
Court's Ultimatum: Pay Compensation to Manjha Victims by May 4, or the Collector Will Pay the Fine Out of Their Own Pocket!
बॉम्बे हाई कोर्ट के औरंगाबाद खंडपीठ की प्रतीकात्मक फोटो (सोर्स: सोशल मीडिया)
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Nylon Manja Compensation: जानलेवा नायलॉन मांझा से घायल हुए पीड़ितों को न्याय दिलाने में हो रही प्रशासनिक देरी पर बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद खंडपीठ ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर 4 मई 2026 तक पीड़ितों के खातों में मुआवजे की राशि जमा नहीं हुई, तो संबंधित जिलाधिकारियों को भारी जुर्माना भुगतना होगा।

अदालत की फटकार: "यह बेहद खेदजनक है"

न्यायमूर्ति विभा कंकणवाडी और न्यायमूर्ति नीरज पी. धोटे की पीठ ने राज्य सरकार की सुस्ती पर गहरी नाराजगी जताई। अदालत ने 16 जनवरी 2026 को ही 11 पीड़ितों (जिनमें धुराजी वानखेड़े, साबीर शेख, सोपान गाडे, महेश पाटील और ऋषिकेश वाघमारे शामिल हैं) को मुआवजा देने का आदेश दिया था। महीनों बीत जाने के बाद भी पीड़ितों को राशि न मिलना न्याय प्रक्रिया का मजाक उड़ाने जैसा है।

देरी हुई तो कलेक्टर को अपनी जेब से देना होगा जुर्माना

बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद खंडपीठ ने इस बार केवल आदेश नहीं दिया, बल्कि अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय कर दी है। कोर्ट के नए निर्देश के अनुसार मुआबजा वितरण के लिए 4 मई 2026 की अंतिम समय सीमा तय की गई है। यदि इस तिथि तक भुगतान नहीं हुआ, तो छत्रपति संभाजीनगर, जलगांव और अहिल्यानगर के जिलाधिकारियों (District Collectors) को अपनी जेब से जुर्माना देना होगा। निर्धारित समय के बाद हर दिन की देरी पर प्रति लाभार्थी 1000 रुपये का दंड अधिकारियों पर लगाया जाएगा।

जनहित याचिका पर सुनवाई

यह पूरा मामला नायलॉन मांझा पर प्रतिबंध को लेकर दायर एक जनहित याचिका से जुड़ा है। नायलॉन मांझा न केवल इंसानों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है, बल्कि पक्षियों को भी भारी नुकसान पहुँचा रहा है। कोर्ट के इस कड़े रुख से यह संदेश गया है कि जनहित के आदेशों की अनदेखी अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

जवाबदेही की नई मिसाल

अक्सर देखा जाता है कि अदालती आदेश फाइलों में दबे रह जाते हैं, लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद खंडपीठ द्वारा जिलाधिकारियों पर व्यक्तिगत दंड लगाने की चेतावनी एक नई मिसाल पेश करती है। यह फैसला न केवल 11 पीड़ितों को त्वरित आर्थिक मदद सुनिश्चित करेगा, बल्कि भविष्य में प्रशासनिक अधिकारियों को न्यायिक आदेशों के प्रति अधिक सतर्क और उत्तरदायी बनाएगा।

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