

Amravati Women Hospital Fire Case: अमरावती जिला स्त्री अस्पताल के एनआईसीयू में 24 अगस्त 2026 को हुए भीषण वेंटिलेटर विस्फोट और तीन नवजात शिशुओं की मौत के मामले में जांच रिपोर्ट सार्वजनिक न होने पर राजनीति गरमा गई है। बुधवार को पूर्व पालकमंत्री डॉ. सुनील देशमुख ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर सरकार और अस्पताल प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि दुर्घटना के पहले दिन से ही असली गुनहगारों, भ्रष्ट ठेकेदारों और अधिकारियों को बचाने तथा डॉक्टरों पर सारा दोष मढ़ने की स्क्रिप्ट तैयार कर ली गई थी। सुनिल देशमुख ने इस दौरान कहा कि राज्य के मुख्यमंत्री फडणवीस व जिले के पालकमंत्री बावनकुले ने कहा थी कि जल्द ही रिपोर्ट का खुलासा करके विरोधियों के मुंह बंद किए जाएगें। मगर कार्रवाई व रिपोर्ट में लिपापोती को देखते हुए यह पुरी तरह हास्यास्पद लग रहा है।
डॉ. देशमुख ने सनसनीखेज खुलासा करते हुए बताया कि अस्पताल में सप्लाई किए गए वेंटिलेटर के स्पेयर पार्ट्स 'शिलर हेल्थकेयर इंडिया' और 'आर आर ग्रुप' के जॉइंट वेंचर द्वारा सप्लाई किए गए ये वेंटिलेटर घटिया दर्जे के थे। इसी कंपनी के वेंटिलेटर के कारण 2021 में भंडारा अस्पताल (10 नवजात शिशुओं की मौत) और अहिल्यानगर में 2019 में हादसे हो चुके हैं।जिसमें 11 कोरोना मरिजों की मौत हुई थी।
वर्ष 2021 में ही इस कंपनी को ब्लैकलिस्ट किया जाना चाहिए था, लेकिन सत्ताधारियों के संरक्षण के कारण इसे अभय मिलता रहा। इसके अलावा, इर्विन अस्पताल के लिए 12 लाख रुपये का वेंटिलेटर 23 लाख रुपए में खरीदकर करोड़ों रुपए के घोटाले को अंजाम दिया गया।
जांच रिपोर्ट के पन्ना नंबर 15 पर दावा किया गया है कि परिचारिका (नर्स) द्वारा बच्चे को फीडिंग कराते समय अचानक विस्फोट हुआ। डॉ. देशमुख ने सीसीटीवी फुटेज का हवाला देते हुए इस दावे को खारिज किया।
फुटेज के अनुसार, वेंटिलेटर में लगभग 1 मिनट तक स्पार्किंग और लाल रोशनी दिखाई दे रही थी। यदि वहां कोई कर्मचारी तैनात होता तो तुरंत बिजली बंद कर हादसा टाला जा सकता था। कक्ष सेविका बाहर पोर्च में सो रही थी और हेड नर्स धमाके के बाद पास के कमरे से भागती हुई बाहर आई।
अस्पताल निर्माण का मूल ठेका 'शुभम ईपीसी प्राइवेट लिमिटेड' को मिला था, जिसने नियमों को ताक पर रखकर इलेक्ट्रिकल का काम अमरावती के मनोज ठक्कर और फायर सेफ्टी का काम 'एस.आर. एसोसिएट्स' (नागपुर) को सबलेट कर दिया। मनपा से आज तक इस इमारत को 'ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट' नहीं मिला है और न ही सोलर सिस्टम चालू है। प्रेशर टेस्टिंग में फायर पाइपलाइन केवल 6 से 7 केजी/सेमी² का दबाव ही झेल सकी और फट गई, जबकि मानक 15 केजी/सीएम² का होना चाहिए था।
डॉ. देशमुख ने आरोप लगाया कि सपोर्ट फैसिलिटी और तकनीकी कर्मचारियों की नियुक्ति न करने की मुख्य जिम्मेदारी स्वास्थ्य सचिव, एनएचएम निदेशक और प्रशासन की थी, लेकिन सारा ठीकरा डॉक्टरों और सिविल सर्जन पर फोड़कर उन्हें निलंबित कर दिया गया। उन्होंने मांग की है कि बेगुनाह डॉक्टरों पर से निलंबन हटाया जाए और फर्जी ठेकेदारों व जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर कड़ी कार्रवाई की जाए।