रिश्वत प्रकरण में मुर्तिजापुर के वकील को राहत नहीं, हाईकोर्ट ने वकालत पेशे पर दिया कड़ा संदेश

मुंबई उच्च न्यायालय ने मुर्तिजापुर के वकील सचिन वानखेडे का एफआईआर रद्द करने का आवेदन खारिज किया, वकालत की नैतिकता पर दिया कड़ा संदेश।
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Murtijapur: वकालत एक नॉबल प्रोफेशन है और उसकी प्रतिष्ठा, नैतिकता तथा समाज का विश्वास बनाए रखना अत्यावश्यक है. इसी स्पष्ट संदेश के साथ मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने मुर्तिजापुर के अधिवक्ता सचिन वानखेडे का एफआईआर रद्द करने का आवेदन खारिज कर दिया. शिकायतकर्ता राजेश कांबे ने अपने पुत्र के गंभीर मामले में कानूनी मदद के लिए वानखेडे को नियुक्त किया था.

आरोप है कि उन्होंने जेल में सुविधा दिलाने के नाम पर पुलिस की ओर से 1 से 1.25 लाख रुपये की मांग की. एसीबी की जांच में सामने आया कि वानखेडे ने मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए रिश्वत देने के लिए प्रेरित किया. जांच में बातचीत की रिकॉर्डिंग, पंचनामा और वॉइस सैंपल भी मेल खाते पाए गए. न्यायालय ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और 15 के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं, लेकिन धारा 12 अभिप्रेरण के अंतर्गत कार्रवाई के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है.

समझौते का दावा भी अदालत ने खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार जैसे गंभीर अपराधों में केवल समझौते के आधार पर कार्रवाई रोकी नहीं जा सकती. न्यायमूर्ति उर्मिला जोशीफाल्के ने टिप्पणी की कि वकील समाज का जिम्मेदार घटक है. क्लाइंट का शोषण करना या गलत मार्ग सुझाना अस्वीकार्य है. ऐसे कृत्य न्यायव्यवस्था पर जनता का विश्वास कमजोर कर सकते हैं. परिणामस्वरूप, वानखेडे का आवेदन नामंजूर कर दिया गया और मामले की आगे की न्यायिक प्रक्रिया जारी रहेगी.

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