गणेशोत्सव स्पेशल: जिन हाथों से हुए अपराध वही हाथ बना रहे गणपति की मूर्तियां, कैदियों ने चुनी नई राह

Ganeshotsav Special Jabalpur: कानून तोड़ने वाले हाथ अब मिट्टी, गोबर और तुलसी के बीजों से गढ़ रहे हैं इको-फ्रेंडली 'तुलसी गणेश'। विसर्जन के बाद घर में ही पौधे के रूप में पनपेंगे बाप्पा।
prisoners make Ganpati idols during Ganeshotsav
सेंट्रल जेल में मूर्तियां बनाते हुए कैदी(सोर्स- सोशल मीडिया)
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Prisoners Making Ganpati Idols Jabalpur: जबलपुर के नेताजी सुभाष चंद्र बोस केंद्रीय जेल में बंद कैदी भगवान गणेश की प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं। जेल की चारदीवारी के भीतर तैयार हो रही ये प्रतिमाएं सिर्फ आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और बंदियों के पुनर्वास का संदेश भी दे रही हैं। खास बात यह है कि इन गणपति प्रतिमाओं को मिट्टी और गोबर के मिश्रण से तैयार किया जा रहा है।

प्रतिमाओं में तुलसी के बीज भी रखे गए हैं। यानी गणेशोत्सव के बाद जब इन प्रतिमाओं का घर में विसर्जन किया जाएगा तो प्रतिमा की मिट्टी को गमले या आंगन में रखा जा सकता है और उसी मिट्टी से तुलसी का पौधा पनप सकता है।

12 कैदियों ने बनाईं 125 से ज्यादा प्रतिमाएं

जिन हाथों ने कभी कानून तोड़ा था, वही हाथ अब भगवान गणेश की प्रतिमा गढ़ रहे हैं। जेल प्रबंधन द्वारा बंदियों को अलग-अलग रचनात्मक और उपयोगी कार्यों का प्रशिक्षण देकर उन्हें अपराध की दुनिया से दूर रखने और समाज में दोबारा बेहतर नागरिक के रूप में स्थापित करने की दिशा में काम किया जा रहा है। गणेशोत्सव पर्व के लिए केंद्रीय जेल में करीब 125 गणेश प्रतिमाएं तैयार की गई हैं। इन प्रतिमाओं को देखकर आम नागरिक भी खासा प्रभावित हो रहे हैं और कई लोग जेल में बनी इन पर्यावरण अनुकूल प्रतिमाओं को अपने घरों में स्थापित करने के लिए ले जा रहे हैं।

जेल में प्रतिभाशाली को दिया जाता है अवसर

जेल पहुंचने वाला हर शख्स अपराधी नहीं होता, बल्कि उनमें प्रतिभाएं भी होती हैं, जिन्हें सही दिशा दी जाए तो वे अपनी क्षमताओं से कुछ अलग कर सकते हैं। जेल प्रबंधन द्वारा ऐसे कैदियों की प्रतिभा को पहचानकर उन्हें मार्गदर्शन और सहयोग दिया जाता है, जिसका परिणाम यह है कि कई कैदी जेल्स बाहर निकालने के बाद नई जिंदगी भी शुरू कर चुके हैं। जेल प्रबंधन द्वारा किया जा रहा यह प्रयास जेल में बंद कैदियों को नया रास्ता दिखा रहा है, जिससे वह भविष्य में अपराध का रास्ता छोड़कर समाज में सम्मान के साथ जीवन यापन कर सकें।

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रचनात्मक काम से विकसित हो रहा बंदियों का हुनर

इन प्रतिमाओं की खासियत सिर्फ इनका पर्यावरण अनुकूल होना नहीं है, बल्कि इनके जरिए बंदियों को आत्मनिर्भरता और जिम्मेदारी की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर भी मिल रहा है। प्रतिमा निर्माण जैसे रचनात्मक काम से बंदियों में हुनर विकसित हो रहा है, वहीं तैयार प्रतिमाओं की बिक्री से उन्हें अपने श्रम का महत्व समझने का मौका मिल रहा है। इस पहल के जरिए जेल प्रशासन का उद्देश्य बंदियों में सकारात्मक सोच विकसित करना और उन्हें समाज की मुख्यधारा में लौटने के लिए तैयार करना है।

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