

Bhopal Resident Ajay Singh NDPS Compensation Case: भोपाल निवासी अजय सिंह को एयरपोर्ट स्कैनिंग मशीन की गलतफहमी के कारण ड्रग्स तस्करी के आरोप में 57 दिन जेल में बिताने पड़े। मलेशिया में व्यापार और नौकरी करने वाले अजय सिंह 6 मई 2010 को भोपाल एयरपोर्ट से यात्रा के लिए पहुंचे थे। लगेज स्कैनिंग के दौरान मशीन ने अलार्म दिया, जिसके बाद सुरक्षा एजेंसियों ने उनके सामान की जांच की।
बैग में गरम मसाले और अमचूर के पैकेट मिलने पर मशीन ने उन्हें संदिग्ध पदार्थ मान लिया और एनडीपीएस एक्ट के तहत कार्रवाई करते हुए अजय सिंह को हिरासत में ले लिया गया। बाद में जांच रिपोर्ट में मसालों को निर्दोष पाया गया। अब 16 साल बाद हाईकोर्ट ने उन्हें बाइज्जत बरी करते हुए 10 लाख रुपए मुआवजा देने के आदेश दिए हैं।
मामले की जांच के लिए जब्त सामग्री को स्टेट लेबोरेटरी भेजा गया। उस वक्त मैडा सब्सटेंस एक नई तरह की ड्रग थी और स्टेट लैब में पर्याप्त उपकरण उपलब्ध नहीं होने के कारण जांच पूरी नहीं हो सकी, इसके बाद सक्षम अधिकारियों को सूचना दी गई और बिना देर किए सैंपल को आगे केंद्रीय प्रयोगशाला भेजा गया। वहां परीक्षण के बाद स्पष्ट हुआ कि जिस पदार्थ को शुरुआती स्तर पर मेडा ड्रग के माना गया था वह वास्तव में प्रतिबंधित मादक पदार्थ नहीं था बल्कि मसाले हो थे।
जब तब जांच रिपोर्ट आई तब तक 57 दिन बीत चुके थे और अजय सिंह को न्यायिक हिरासत में ही रहना पड़ा। 2 जुलाई 2010 को इस मामले में अजय सिंह की रिहाई हुई। रिहाई के बाद अजय सिंह ने राहत की सांस तो ली लेकिन इतने दिनों तक बिना किसी अपराध के जेल में रहने के कारण उन्होंने एयरपोर्ट की जांच की खामियों के खिलाफ लड़ाई लड़ने का मन बना लिया था।
जेल से छूटने के बाद अजय सिंह ने कानून के जानकारों से इस विषय में सलाह ली और वर्ष 2011 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर करते हुए दरवाजा खटखटाया। याचिका में उन्होंने मामले की सीबीआई जांच, एयरपोर्ट पर इस्तेमाल होने वाली संबंधित एशिया पेसिफिक स्कैनिंग मशीनों पर रोक, गिरफ्तारी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कानूनी और विभागीय कार्रवाई, फॉरेंसिक जांच में हुई देरी की जांच और 57 दिन जेल में रहने के एवज में 10 करोड़ रुपये की मुआवजे की मांग की। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता सुमित रघुवंशी द्वारा पक्ष रखा गया कि अधिकारियों द्वारा की गई कार्रवाई एनडीपीएस एक्ट की संबंधित धाराओं के तहत कानून सम्मत थी और उपलब्ध परिस्थितियों में नियमानुसार कार्रवाई की गई थी।
27 अप्रैल 2026 को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद उच्च न्यायालय ने माना कि मामले में याचिकाकर्ता को 57 दिन तक जेल में बिना अपराध के रहना पड़ा। इसलिए मानवीय आधार पर उन्हें 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाना उचित है। हालांकि याचिका में मांगी गई अन्य राहतों को न्यायालय ने स्वीकार नहीं किया।
अधिवक्ता सुमित रघुवंशी ने यह भी बताया कि वर्तमान निर्णय के बाद केस को डिस्पोज ऑफ कर दिया गया है याचिकर्ता को निर्देशित किया गया है कि ऑर्डर शीट की कापी भोपाल कलेक्टर के समक्ष प्रस्तुत करे तथा भोपाल कलेक्टर सक्षम अधिकारियों को मुआवजा राशि दिलाने के लिए आदेशित करें।