Political Analysis: मालवा-निमाड़ की 66 सीटों का खेल, 2028 से पहले BJP के गढ़ में सेंध लगाएगी कांग्रेस?

Rahul Gandhi Indore Visit: राहुल गांधी का 19 सितंबर को इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम है। मालवा-निमाड़ में युवाओं के मुद्दों के जरिए कांग्रेस की 2028 की सियासी रणनीति पर नजर है।
Rahul Gandhi in Indore for Students Ki Goonj programme
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधीफोटो सोर्स - सोशल मीडिया
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Rahul Gandhi Chhatron Ki Goonj Program : इंदौर में 19 सितंबर को राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम होने जा रहा है। कार्यक्रम भले ही सितंबर में हो रहा हो, लेकिन इसकी सियासी गूंज मालवा-निमाड़ की राजनीति में दूर तक सुनाई दे सकती है। कांग्रेस इसे युवाओं, छात्रों, रोजगार, शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर संवाद के तौर पर पेश कर रही है, वहीं बीजेपी के लिए यह कार्यक्रम विपक्ष की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें कांग्रेस युवाओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

सत्ता की चाबी कहे जाने वाले मालवा-निमाड़ में ‘छात्रों की गूंज’ के बहाने कांग्रेस उस इलाके में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है, जो प्रदेश में उसे एक बार फिर सत्ता तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा सकता है।

कार्यक्रम को लेकर चल रही खींचतान

इंदौर में होने वाले राहुल गांधी के कार्यक्रम को लेकर पहले से ही सियासी खींचतान सामने आ चुकी है। कांग्रेस ने नेहरू स्टेडियम में कार्यक्रम की अनुमति मांगी थी, लेकिन अनुमति नहीं मिलने के बाद कार्यक्रम को 19 सितंबर तक टालना पड़ा। कांग्रेस ने इसे सरकार की असहजता से जोड़कर हमला बोला, जबकि बीजेपी की ओर से प्रक्रिया और वैकल्पिक स्थानों को लेकर सवाल उठाए गए। यानी राहुल गांधी के इंदौर दौरे से पहले ही कार्यक्रम राजनीतिक बहस का मुद्दा बन चुका है। हालांकि, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अनुमति को लेकर हुआ विवाद भी कांग्रेस के लिए कार्यक्रम को चर्चा में लाने का एक जरिया बन गया।

मालवा-निमाड़ क्यों है इतनी बड़ी सियासी प्रयोगशाला?

मालवा-निमाड़ में विधानसभा की 66 सीटें आती हैं। यह मध्य प्रदेश की 230 सदस्यीय विधानसभा का बड़ा हिस्सा है। यही वजह है कि इस क्षेत्र में जिस पार्टी का प्रदर्शन मजबूत होता है, उसका प्रदेश की सत्ता की दौड़ में दावा भी मजबूत हो जाता है। 2018 में कांग्रेस ने मालवा-निमाड़ में बीजेपी को बड़ा झटका दिया था। कांग्रेस ने 35 सीटों पर जीत दर्ज की और इसी प्रदर्शन ने उसे प्रदेश में सरकार बनाने के करीब पहुंचाया। लेकिन 2023 में कहानी पूरी तरह बदल गई। बीजेपी ने वापसी करते हुए क्षेत्र की 66 में से 47 सीटें जीत लीं। कांग्रेस 18 सीटों पर सिमट गई, जबकि एक सीट भारत आदिवासी पार्टी के खाते में गई। यानी पांच साल के भीतर मालवा-निमाड़ का राजनीतिक मूड कांग्रेस के पक्ष से बीजेपी के पक्ष में तेजी से शिफ्ट हुआ।

2028 से पहले राहुल की युवा पॉलिटिक्स

कांग्रेस की नजर अब उस वोट बैंक पर है, जो आने वाले चुनावों में निर्णायक भूमिका निभा सकता है और वह है युवा और छात्र वर्ग। ‘छात्रों की गूंज’ अभियान के जरिए कांग्रेस बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक, महंगी शिक्षा, कोचिंग और रोजगार जैसे मुद्दों को युवाओं के बीच ले जाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस के मुताबिक, यह अभियान देशभर के सैकड़ों शहरों तक पहुंचाने की योजना का हिस्सा है। लेकिन इंदौर को इसके लिए चुनना भी अपने आप में महत्वपूर्ण है। इंदौर मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा शहरी और शिक्षा का प्रमुख केंद्र है। यहां बड़ी संख्या में कॉलेज, विश्वविद्यालय, कोचिंग संस्थान हैं और प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से छात्र आते हैं। यानी इंदौर में राहुल गांधी का मंच सिर्फ इंदौर के युवाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसकी राजनीतिक पहुंच मालवा-निमाड़ के दूसरे जिलों तक ले जाने की कोशिश होगी।

कांग्रेस की रणनीति, युवा से शुरू होकर मालवा-निमाड़ तक

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2018 वाला प्रदर्शन दोहराने की है। 2018 में किसान, आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस को मजबूत समर्थन मिला था, लेकिन 2023 में बीजेपी ने इन क्षेत्रों में बड़ी वापसी की। अब कांग्रेस की कोशिश पुराने मुद्दों के साथ एक नया राजनीतिक नैरेटिव जोड़ने की दिखाई देती है। राहुल गांधी का कार्यक्रम इसी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। कांग्रेस के सामने सवाल यह है कि क्या वह छात्रों और युवाओं के मुद्दों को सिर्फ एक कार्यक्रम तक सीमित रखने के बजाय बूथ स्तर की राजनीति से जोड़ पाएगी और क्या इन मुद्दों को वोट में बदल पाएगी। अगर कार्यक्रम के बाद कांग्रेस युवा संगठनों, एनएसयूआई, युवा कांग्रेस और स्थानीय नेताओं के जरिए इन मुद्दों को लगातार जमीन पर ले जाती है, तो यह उसके लिए 2028 की लंबी तैयारी की शुरुआत हो सकती है।

बीजेपी की नजर मालवा-निमाड़ के समीकरण पर

बीजेपी के लिए इस कार्यक्रम पर नजर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मालवा-निमाड़ फिलहाल उसका मजबूत राजनीतिक क्षेत्र है। 2023 में 66 में से 47 सीटें जीतने के बाद बीजेपी के पास इस क्षेत्र में मजबूत संगठनात्मक आधार है। इंदौर की सभी नौ विधानसभा सीटों पर भी बीजेपी ने जीत दर्ज की थी। इसके अलावा इंदौर में कांग्रेस के पूर्व विधायक भी बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। ऐसे में बीजेपी की चुनौती केवल राहुल गांधी के कार्यक्रम का जवाब देना नहीं है। चुनौती यह भी है कि कांग्रेस युवाओं के बीच शिक्षा, रोजगार और परीक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों को ऐसा राजनीतिक नैरेटिव न बना दे, जिससे सरकार के खिलाफ असंतोष को एकजुट करने का मौका मिले। इसलिए बीजेपी राहुल गांधी के कार्यक्रम को लेकर जवाबी रणनीति पर काम कर सकती है—एक तरफ सरकार की उपलब्धियां गिनाना और दूसरी तरफ कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक प्रचार के तौर पर पेश करना।

आदिवासी बेल्ट पर भी रहेगी दोनों दलों की नजर

मालवा-निमाड़ की राजनीति में आदिवासी वोट बेहद महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र की 66 विधानसभा सीटों में 22 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। आदिवासी वोट बैंक लंबे समय से कांग्रेस और बीजेपी दोनों की रणनीति के केंद्र में रहा है। कांग्रेस अगर 2028 में बीजेपी को चुनौती देना चाहती है तो उसे सिर्फ शहरी युवाओं को साधना पर्याप्त नहीं होगा। उसे झाबुआ, अलीराजपुर, धार, बड़वानी, खरगोन, रतलाम और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों में भी अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करनी होगी। यही कारण है कि राहुल गांधी के इंदौर कार्यक्रम का संदेश अगर युवाओं के साथ आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाया जाता है, तो उसका राजनीतिक असर ज्यादा बड़ा हो सकता है।

Rahul Gandhi in Indore for Students Ki Goonj programme
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इंदौर क्यों बना कांग्रेस और बीजेपी की सियासी जंग का केंद्र

इंदौर लंबे समय से बीजेपी का मजबूत गढ़ माना जाता है। 2023 में बीजेपी ने इंदौर जिले की सभी नौ विधानसभा सीटें जीती थीं। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी ने मध्य प्रदेश की सभी 29 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की। इंदौर में बीजेपी उम्मीदवार शंकर लालवानी की जीत का अंतर भी रिकॉर्ड स्तर पर रहा। ऐसे में राहुल गांधी का इंदौर आना कांग्रेस के लिए प्रतीकात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण है। सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस इंदौर में तत्काल बीजेपी को हरा पाएगी या नहीं, बल्कि यह है कि क्या कांग्रेस बीजेपी के सबसे मजबूत शहरी गढ़ में युवाओं के बीच अपनी राजनीतिक मौजूदगी दोबारा स्थापित कर सकती है। यही कोशिश ‘छात्रों की गूंज’ को महज एक कार्यक्रम से आगे ले जाकर 2028 की सियासी तैयारी का संकेत बना सकती है।

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