डिंडोरी : 20 लाख में खरीदे 10 लाख कीड़ों के सिर, साल के जंगल बचाने का अनोखा अभियान

Sal Tree Protection Campaign : डिंडोरी में साल के जंगल बचाने के लिए वन विभाग ने 10 लाख साल बोरर कीड़ों के सिर खरीदे। प्रति सिर 2 रुपये के हिसाब से ग्रामीणों को 20 लाख रुपये का भुगतान किया जाएगा।
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कीड़ों की माला (फोटो सोर्स- नवभारत)
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Dindori Sal Borer News: डिंडोरी जिले में साल (सरई) के जंगलों को बचाने के लिए वन विभाग ने अनोखी पहल शुरू की है। विभाग 10 लाख साल बोरर कीड़ों के सिर खरीदने पर करीब 20 लाख रुपये खर्च कर रहा है। प्रत्येक कीड़े के सिर के बदले ग्रामीणों को 2 रुपये की प्रोत्साहन राशि दी जा रही है। अब तक ग्रामीण 10 लाख से अधिक कीड़ों के सिर वन विभाग के संग्रहण केंद्रों पर जमा करा चुके हैं।

वन विभाग के अनुसार साल बोरर कीट ने जिले के करीब 30,487 हेक्टेयर वन क्षेत्र और 1.46 लाख से अधिक साल के पेड़ों को प्रभावित किया है। कीटों की संख्या कम करने और जंगलों को बचाने के लिए 20 जून से 30 जुलाई तक विशेष 'ट्रैप ट्री ऑपरेशन' चलाया जा रहा है।

कीड़ों के सिर की माला बना रहे ग्रामीण

अभियान के तहत हर दो हेक्टेयर क्षेत्र में एक साल के पेड़ को काटकर उसकी छाल को पीटा जाता है। पेड़ से निकलने वाले रस की गंध से आकर्षित होकर साल बोरर कीट वहां पहुंचते हैं। सुबह 5 से 7 बजे के बीच ग्रामीण इन कीटों को पकड़कर उनके सिर अलग करते हैं और मालाओं के रूप में वन विभाग के संग्रहण केंद्रों पर जमा कराते हैं।

5 केंद्रों पर जमा हो रहे कीड़ों के सिर

खारिडीह, चौरादादर, कबीर, जगतपुर और करंजिया में बनाए गए पांच संग्रहण केंद्रों पर कीड़ों के सिर जमा किए जा रहे हैं। वन विभाग प्रत्येक सिर के बदले 2 रुपये का भुगतान सीधे ग्रामीणों के बैंक खातों में करेगा। विभाग के मुताबिक अब तक करीब 20 लाख रुपये का भुगतान बन चुका है।

1.46 लाख पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव

साल बोरर के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए 1 लाख 46 हजार 784 प्रभावित साल के पेड़ों की कटाई के लिए भारत सरकार को प्रस्ताव भेजा गया है। अनुमति मिलने के बाद कटाई शुरू की जाएगी, ताकि संक्रमण को आगे फैलने से रोका जा सके।

तनों को खोखला कर देते हैं ये कीड़े

वन विभाग अधिकारियों का कहना है कि साल बोरर केवल साल के पेड़ों पर हमला करता है और तने को भीतर से खोखला कर देता है। समय रहते नियंत्रण नहीं होने पर यह पूरे जंगल में तेजी से फैल सकता है। इसी वजह से ग्रामीणों की भागीदारी से यह विशेष अभियान चलाया जा रहा है।

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