

Caste Equation In Datia By Election: दतिया विधानसभा उपचुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां चरम पर पहुंच चुकी हैं। इस बार मुकाबला केवल विकास और स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी चुनावी रणनीति सामाजिक और जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती नजर आ रही है।
भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही इस बात को अच्छी तरह समझती हैं कि दतिया की सत्ता तक पहुंचने का रास्ता विभिन्न समाजों के वोट बैंक से होकर गुजरता है। यही वजह है कि दोनों दलों ने क्षेत्र की प्रमुख जातियों के प्रभावशाली नेताओं को चुनावी मैदान में उतार दिया है, ताकि अपने-अपने सामाजिक आधार को मजबूत किया जा सके।
दतिया में ब्राह्मण समाज को भारतीय जनता पार्टी का पारंपरिक वोट बैंक माना जाता है। इसी कारण पार्टी ने पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा और प्रदेश महामंत्री शैलेंद्र बरुआ को इस वर्ग के बीच सक्रिय जिम्मेदारी सौंपी है। दूसरी ओर कांग्रेस ने ब्राह्मण वोटों में सेंध लगाने के लिए नेता प्रतिपक्ष हेमंत कटारे, पंकज उपाध्याय और अवनीश भार्गव को मैदान में उतारा है। वहीं, कुशवाह समाज को इस चुनाव का सबसे अहम 'किंगमेकर' माना जा रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में इस समाज की नाराजगी का असर भाजपा को झेलना पड़ा था।
इसे देखते हुए कांग्रेस ने सतना विधायक सिद्धार्थ कुशवाह और पूर्व मंत्री लक्ष्मण सिंह को विशेष जिम्मेदारी देकर इस वर्ग को अपने पक्ष में लामबंद करने की रणनीति बनाई है। अनुसूचित जाति वर्ग में भाजपा की ओर से उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा और सांसद संध्या राय मोर्चा संभाल रहे हैं, जबकि कांग्रेस ने फायरब्रांड नेता फूल सिंह बरैया को इस वर्ग के बीच सक्रिय किया है।
दतिया के चुनावी समीकरण केवल तीन-चार जातियों तक सीमित नहीं हैं। यादव, ठाकुर-राजपूत, वैश्य, मुस्लिम, लोधी, बघेल-पाल और रावत (मीणा) समाज के मतदाता भी जीत-हार तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि दोनों दलों के वरिष्ठ नेता लगातार जनसंपर्क, सामाजिक बैठकों और संवाद कार्यक्रमों के जरिए इन वर्गों तक पहुंचने का प्रयास कर रहे हैं। राजनीतिक दलों का मानना है कि छोटे-छोटे वोट प्रतिशत भी करीबी मुकाबले में निर्णायक साबित हो सकते हैं।
करीब दो लाख से अधिक मतदाताओं वाली दतिया विधानसभा में अनुसूचित जाति (एससी) सबसे बड़ा वोट बैंक है, जिसके मतदाताओं की संख्या लगभग 58 से 60 हजार बताई जाती है। इनमें जाटव-अहिरवार समाज की संख्या सबसे अधिक है और राजनीतिक तौर पर इनका झुकाव परंपरागत रूप से कांग्रेस की ओर माना जाता है। जिसके बाद 33 से 35 हजार ब्राह्मण मतदाता हैं, जिन्हें भाजपा का मजबूत आधार माना जाता है।
कुशवाह समाज के 28 से 30 हजार वोट किसी भी उम्मीदवार की जीत-हार तय करने की क्षमता रखते हैं। वहीं यादव और ठाकुर-राजपूत समाज के 14 से 18 हजार मतदाता भी चुनावी तस्वीर बदल सकते हैं। वैश्य समाज के 12 से 15 हजार मतदाता शहरी क्षेत्रों में प्रभाव रखते हैं, जबकि मुस्लिम मतदाता और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) भी कई मतदान केंद्रों पर निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
दतिया उपचुनाव में इस बार केवल उम्मीदवारों की लोकप्रियता नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों को साधने की रणनीति भी कसौटी पर होगी। भाजपा अपने पारंपरिक वोट बैंक को बरकरार रखने के साथ नए वर्गों में पैठ बनाने की कोशिश कर रही है, जबकि कांग्रेस पिछली नाराजगियों और सामाजिक समीकरणों का लाभ उठाकर वापसी की रणनीति पर काम कर रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि दोनों दलों के दिग्गज नेताओं की मेहनत कितनी रंग लाती है और दतिया की जनता किसके पक्ष में अपना जनादेश देती है।
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