

छिंदवाड़ा के जमानिया गांव में नवरात्रि पर होती है रावण पेन की पूजा।
आदिवासी समाज नौ दिनों तक प्रतिमा स्थापित कर करता है आराधना।
नवरात्रि समाप्त होने पर नदी में किया जाता है प्रतिमा का विसर्जन।
पिछले 9 वर्षों से लगातार निभाई जा रही है यह परंपरा।
Ravan Pen Worship During Navratri: मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में नवरात्रि के दौरान एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जो आमतौर पर देखने को नहीं मिलती। यहां जिला मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित जमानिया गांव में आदिवासी समाज के लोग रावण की प्रतिमा स्थापित कर नौ दिनों तक पूजा-अर्चना करते हैं।
इस दौरान रावण को ‘रावण पेन’ के रूप में मानकर उनकी आराधना की जाती है। जहां नवरात्रि में अधिकांश स्थानों पर मां दुर्गा की पूजा होती है, वहीं इस गांव में रावण पेन की पूजा भी आस्था और परंपरा के साथ की जाती है।
नवरात्रि त्यौहार के अवसर पर जमानिया गांव में आदिवासी समाज के लोग एकत्रित होकर रावण पेन की प्रतिमा स्थापित करते हैं। इसके बाद लगातार नौ दिनों तक विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्रि के समापन पर प्रतिमा का नदी में विसर्जन कर दिया जाता है। गांव में मां दुर्गा की आराधना और रावण पेन की पूजा, दोनों परंपराएं अपने-अपने तरीके से निभाई जाती हैं। इस दौरान समाज के लोग अपनी धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा में शामिल होते हैं।
समिति के सदस्य सुमित के अनुसार, छिंदवाड़ा जिले के जमानिया गांव में रावण पेन की प्रतिमा स्थापित कर पूजा करने की परंपरा पिछले नौ वर्षों से लगातार चली आ रही है। हर साल नवरात्रि के दौरान समाज के लोग एकजुट होकर इस आयोजन में हिस्सा लेते हैं। नौ दिनों तक पूजा करने के बाद प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। इस परंपरा के जरिए आदिवासी समाज अपनी मान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ा रहा है।
आदिवासी समाज के लोगों की मान्यता है कि रावण पेन उनके पूर्वजों से जुड़े हुए हैं। उन्हें मरावी गोत्र से संबंधित माना जाता है। समाज में 750 गोत्र होने की मान्यता का उल्लेख करते हुए समिति के सदस्य रावण पेन को भी अपने वंशजों में शामिल मानते हैं। इसी विश्वास और आस्था के चलते उनकी प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती है। जमानिया गांव की यह परंपरा दर्शाती है कि अलग-अलग समुदायों की धार्मिक मान्यताएं और पूजा-पद्धतियां किस तरह स्थानीय संस्कृति से जुड़ी हुई हैं। नवरात्रि त्यौहार के दौरान निभाई जाने वाली यह परंपरा क्षेत्र की आदिवासी आस्था और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है।