

Balaghat Abhijit Dipke Controversy : बालाघाट में कुपोषण से बच्चों की मौत के मुद्दे को लेकर पहुंचे अभिजीत दीपके से सोशल मीडिया इंफ्लूएंसरों द्वारा किए गए तीखे सवालों का मामला अब चर्चा का विषय बन गया है। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक सुधीर दंडोतिया से खास बातचीत की गई। उन्होंने कहा कि इस घटना ने अभिजीत दीपके को नुकसान पहुंचाने के बजाय उन्हें फायदा ही पहुंचाया है।
सुधीर दंडोतिया के मुताबिक, इस घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर पत्रकारिता और मीडिया की छवि पर पड़ा है। उन्होंने सवाल उठाया कि दीपके से सवाल करने वाले लोग पत्रकार नहीं, बल्कि सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर थे। ऐसे में पूरे घटनाक्रम को पत्रकारिता से जोड़कर देखना उचित नहीं है।
सुधीर दंडोतिया ने कहा कि बालाघाट में जिस तरह अभिजीत दीपके से सवाल-जवाब हुए, उससे उनका राजनीतिक या सार्वजनिक नुकसान होने के बजाय उनकी चर्चा और बढ़ गई। एक स्थानीय मुद्दा इस घटनाक्रम के बाद बड़े स्तर पर सामने आया और बालाघाट में कुपोषण से बच्चों की मौत का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया।
उन्होंने कहा कि अभिजीत दीपके खुद यह स्पष्ट कर चुके हैं कि उनकी राजनेता बनने की कोई योजना नहीं है। बावजूद इसके अगर कोई व्यक्ति विपक्ष की भूमिका में रहकर सरकार से सवाल करता है और जनता से जुड़े मुद्दों को उठाता है, तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है।
सुधीर दंडोतिया ने कहा कि इस पूरे विवाद का एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि बालाघाट में कुपोषण और बच्चों की मौत का मुद्दा अब स्थानीय सीमाओं से बाहर निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गया है। उनका कहना है कि जिस मुद्दे पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए थी, वह चर्चा इस घटनाक्रम के कारण शुरू हुई। अब सरकार और प्रशासन के सामने भी इस मामले को लेकर जवाबदेही तय करने का दबाव बढ़ना चाहिए।
बालाघाट में कुपोषण से बच्चों की मौत के मुद्दे पर सुधीर दंडोतिया ने कहा कि बच्चों की कुपोषण से मौत कोई सामान्य घटना नहीं है। यह बेहद गंभीर विषय है और सरकार को इसकी जिम्मेदारी तय करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि पूरे मामले की गंभीरता से जांच होनी चाहिए और अगर किसी अधिकारी या जिम्मेदार व्यक्ति की लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई भी होनी चाहिए। बच्चों की मौत जैसे संवेदनशील मामले में केवल बयानबाजी के बजाय जवाबदेही तय करना जरूरी है।
सुधीर दंडोतिया ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि असल में ये सवाल अभिजीत दीपके से पूछे ही नहीं जाने चाहिए थे। उनके मुताबिक, अगर बालाघाट में कुपोषण से बच्चों की मौत हुई है तो मीडिया के सवाल उन अधिकारियों, प्रशासनिक जिम्मेदारों और राजनीतिक नेताओं से होने चाहिए, जिन पर व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि किसी मुद्दे पर सवाल उठाने वाले व्यक्ति से सवाल करने के बजाय उस व्यवस्था से सवाल होना चाहिए, जिसके कारण ऐसी स्थिति पैदा हुई। यही पत्रकारिता की असली भूमिका है। कुल मिलाकर, बालाघाट में अभिजीत दीपके से सोशल मीडिया इंफ्लूएंसरों की बहस और कुपोषण से बच्चों की मौत का मुद्दा अब एक बड़े विमर्श में बदल गया है। सुधीर दंडोतिया के मुताबिक, इस घटनाक्रम ने जहां पत्रकारिता की छवि को लेकर सवाल खड़े किए हैं, वहीं बालाघाट के गंभीर कुपोषण के मुद्दे को राष्ट्रीय चर्चा में लाने का काम भी किया है।