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भोपाल के टीटी नगर स्थित माता मंदिर में मां शीतला के स्वयं प्रकट होने की मान्यता है।
स्थानीय परंपराओं के अनुसार, माता के प्राकट्य के बाद यहां छोटी-सी मढ़िया बनाकर पूजा शुरू हुई थी।
पुजारी आशीष चतुर्वेदी करीब 47 साल से माता की सेवा कर रहे हैं।
मंदिर के नाम पर ही भोपाल के प्रमुख चौराहे की पहचान माता मंदिर चौराहे के रूप में बनी।
Bhopal Mata Mandir History : राजधानी भोपाल के टीटी नगर स्थित माता मंदिर चौराहा केवल एक प्रमुख चौराहा ही नहीं, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र भी है। यहां विराजित मां शीतला की प्रतिमा को लेकर मान्यता है कि माता किसी मूर्तिकार द्वारा बनाई या स्थापित नहीं की गईं, बल्कि मंदिर परिसर के सामने स्थित खजूर के पेड़ से स्वयं प्रकट हुई थीं। यही वजह है कि इस मंदिर को स्वयंभू माता मंदिर के रूप में भी जाना जाता है।
माता मंदिर के इतिहास को लेकर स्थानीय मान्यताएं काफी पुरानी हैं। मंदिर के बारे में प्रकाशित मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, यहां मां शीतला के प्राकट्य की मान्यता नवाबी दौर से भी पहले की बताई जाती है। कहा जाता है कि माता के प्रकट होने के बाद यहां एक छोटी-सी मढ़िया बनाकर पूजा-अर्चना शुरू की गई थी, जो समय के साथ मंदिर के रूप में विकसित हुई।
माता शीतला की प्रतिमा कब प्रकट हुई थी, इसकी कोई निश्चित तारीख या प्रमाणित ऐतिहासिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। मंदिर की प्राचीनता और माता के प्राकट्य से जुड़ी कहानी मुख्य रूप से स्थानीय मान्यताओं और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं पर आधारित है।
मंदिर के पुजारी आशीष चतुर्वेदी के मुताबिक, वे पिछले करीब 47 वर्षों से मां की सेवा और पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं। इससे पहले उनके परिवार की कई पीढ़ियां भी मंदिर में माता की सेवा करती रही हैं। इस तरह मंदिर से जुड़ी आस्था के साथ-साथ पूजा-पाठ की परंपरा भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही है। मंदिर में विराजित मां शीतला के दर्शन के लिए सालभर श्रद्धालु पहुंचते हैं। नवरात्र के दौरान यहां विशेष धार्मिक माहौल रहता है और भक्त माता के दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं।
माता मंदिर की पहचान इतनी व्यापक है कि इसके नाम पर ही आसपास का क्षेत्र और प्रमुख चौराहा माता मंदिर चौराहे के नाम से प्रसिद्ध हो गया। कभी जंगल और ग्रामीण इलाकों से घिरे इस क्षेत्र में स्थित मंदिर आज भोपाल के विकसित शहरी इलाके के बीच आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
मंदिर परिसर में मां शीतला के साथ अन्य देवी-देवताओं के भी दर्शन किए जा सकते हैं। श्रद्धालुओं के लिए यह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि पुरानी परंपराओं, पारिवारिक विरासत और पीढ़ियों से चली आ रही आस्था का प्रतीक भी है।