

Navbharat Live Analysis On Ladli Behna Yojana: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के लाड़ली बहना योजना के मंहगी पड़ने वाले बयान के बाद चर्चा शुरू हो गई है क्या सरकार को वाकई यह योजना भारी पड़ रही है और क्या सरकार इसे बंद कर सकती है ?
मध्य प्रदेश की बहुचर्चित ‘मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना’, इसके वित्तीय संकट, सरकार की मजबूरी और मुख्यमंत्री मोहन यादव के हालिया बयान को लेकर मध्य प्रदेश के सीनियर पत्रकार और नवभारत लाईव के स्टेट हेड सुधीर दंडोतिया का कहना है कि लाड़ली बहना योजना के बंद होने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। आइये आसान सवालों में समझते लाड़ली बहना योजना क्या वकाई बंद होगी?
जवाब: भोपाल के रवींद्र भवन में एक कार्यक्रम के दौरान जब एक कंटेंट क्रिएटर ने बेटियों के भविष्य को लेकर सवाल पूछा, तो सीएम मोहन यादव ने हल्के-फुल्के और मजाकिया अंदाज में कहा था— "तुमको मालूम नहीं, लाड़ली बहना ही बहुत महंगी पड़ गई। मुझे क्या पता था मुख्यमंत्री बनते ही इतनी भारी मार पड़ती है।"
राजनीतिक और व्यावहारिक मायने: मुख्यमंत्री का यह बयान भले ही अनौपचारिक और मजाकिया लहजे में दिया गया हो, लेकिन इसके पीछे की कड़वी सच्चाई यह है कि यह योजना राज्य के खजाने पर सबसे बड़ा वित्तीय बोझ है। इसे अनौपचारिक रूप से स्वीकार करते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा कि सरकार वित्तीय कठिनाइयों के बावजूद इसे संभाल रही है और राशि को 1,000 रुपए से बढ़ाकर 1,500 रुपए प्रति माह कर दिया गया है।
जवाब: आंकड़ों के लिहाज से यह मध्य प्रदेश सरकार की सबसे बड़ी डीबीटी योजना है, जो खजाने पर भारी पड़ रही है:
पात्र महिलाएं: वर्तमान में इस योजना के तहत राज्य की लगभग 1 करोड़ 25 लाख (1,25,10,150) महिलाएं पात्र हैं।
मासिक खर्च: हर महीने 1,500 रुपए प्रति महिला की दर से केवल मासिक किस्तों के रूप में सरकार के खजाने से लगभग 1,835 करोड़ रुपए सीधे खातों में ट्रांसफर होते हैं।
बजट का भारी हिस्सा: मध्य प्रदेश के बजट (जैसे हालिया वित्त वर्ष में इस योजना के लिए लगभग 23,882 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है)। यह कुल बजट और राज्य के सामाजिक क्षेत्र के खर्च का एक बहुत बड़ा हिस्सा है।
जवाब: योजना के कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष वित्तीय दुष्परिणाम व चुनौतियां हैं:
राजस्व का बड़ा हिस्सा बंध जाना: बजट का एक बड़ा हिस्सा केवल एक ही योजना में चले जाने से अन्य विभागों (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे) के विकास कार्यों के लिए फंड सीमित हो जाता है।
कर्ज पर निर्भरता बढ़ना: वादों और लोकलुभावन योजनाओं को सुचारू रखने के लिए सरकार को हर साल बाजार से भारी मात्रा में कर्ज लेना पड़ रहा है, जिससे राज्य पर कर्ज का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है।
विकास कार्यों में संतुलन की चुनौती: सड़क, बिजली, सिंचाई जैसे कैपिटल एक्सपेंडिचर (पूंजीगत व्यय) और अन्य आधारभूत प्रोजेक्ट्स के लिए वित्तीय प्रबंधन।
जवाब: यह योजना मध्य प्रदेश की राजनीति में गेम-चेंजर साबित हुई थी। राजनीतिक दलों के लिए इसे बंद करना या पीछे हटना एक बहुत बड़ा राजनीतिक जोखिम (Political Suicide) है, क्योंकि इससे सीधा चुनावी नुकसान हो सकता है।
महिला वोट बैंक की ताकत: राज्य में महिला मतदाता (वोटर्स) किसी भी पार्टी की हार-जीत तय करने में निर्णायक भूमिका निभाती हैं। 1.25 करोड़ से अधिक महिलाओं और उनके परिवारों की सीधी आर्थिक जुड़ी होने के कारण सरकार इसे बंद करने का जोखिम नहीं उठा सकती।
प्रतिबद्धता का दबाव: चूंकि योजना को सामाजिक सुरक्षा और महिला सशक्तिकरण के सबसे बड़े हथियार के रूप में प्रचारित किया जा चुका है, इसलिए सरकार कर्ज लेकर या बजट में फेरबदल करके भी इसे किसी तरह चलाए रखने के लिए मजबूर है।
जवाब: नहीं, फिलहाल इस योजना के बंद होने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हाल ही में स्पष्ट किया है कि सरकार महिलाओं के कल्याण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। हालांकि, योजना के भारी वित्तीय बोझ के चलते राजनीतिक गलियारों और आम जनता के बीच इसकी स्थिरता को लेकर चर्चाएं जरूर बनी रहती हैं।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने स्पष्ट किया है कि सरकार बहनों के कल्याण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। शुरुआत में इस योजना के तहत 1,000 रुपए दिए जाते थे, जिसे अब बढ़ाकर 1,500 रुपए प्रति माह कर दिया गया है।