

Fuel Cell Technology: 8 अक्टूबर को वर्ल्ड हाइड्रोजन एंड फ्यूल सेल डे मनाया जाता है। इस का मकसद हाइड्रोजन और फ्यूल सेल से जुड़ी तकनीक के बारे में आम आदमी को जानकारी देना है। भारत की बात करें, तो यह तकनीक इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि देश में नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत हाइड्रोजन के उत्पादन और इस्तेमाल पर काम जारी है।
भारत में हाइड्रोजन का इस्तेमाल परिवहन, उद्योग और एनर्जी के क्षेत्र में बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है, लेकिन आखिर हाइड्रोजन फ्यूल सेल काम कैसे करता है और इससे गाड़ी चलती कैसे है?
फ्यूल सेल एक ऐसा उपकरण है, जो हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच रासायनिक प्रतिक्रिया से बिजली बनाता है। इसमें पेट्रोल या डीजल इंजन की तरह ईंधन को जलाया नहीं जाता है। आसान भाषा में समझें, तो पहले हाइड्रोजन से फ्यूल सेल बनता है, इसके बाद बिजली और फिर बिजली इलेक्ट्रिक मोटर और फिर यह गाड़ियों तक पहुंचता है यानी फ्यूल सेल हाइड्रोजन से बिजली बनाता है और यह बिजली गाड़ी की इलेक्ट्रिक मोटर को चलाती है।
भारत में सीएसआईआर (CSIR) और दूसरी संस्थाएं भी हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक पर काम कर रही हैं। सीएसआईआर ने भारत में विकसित फ्यूल सेल तकनीक से चलने वाली गाड़ी का प्रदर्शन भी किया है।
एक सामान्य फ्यूल सेल में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन अलग-अलग तरफ से पहुंचते हैं। हाइड्रोजन फ्यूल सेल के एक हिस्से, जिसे एनोड कहा जाता है, वहां पहुंचता है। यहां एक खास पदार्थ की मदद से हाइड्रोजन के अणु इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन में अलग हो जाते हैं।
फ्यूल सेल की झिल्ली यानी मेम्ब्रेन प्रोटॉन को आगे जाने देती है, लेकिन इलेक्ट्रॉन को सीधे उस पार नहीं जाने देती। इसलिए इलेक्ट्रॉन बाहर लगे एक रास्ते से होकर दूसरी तरफ जाते हैं। इसी इलेक्ट्रॉन के बहाव से बिजली पैदा होती है।
फ्यूल सेल के दूसरे हिस्से यानी कैथोड पर हवा से ऑक्सीजन पहुंचती है। यहां ऑक्सीजन, प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन आपस में मिलते हैं। इस प्रक्रिया में पानी और गर्मी बनती है यानी शुद्ध हाइड्रोजन से चलने वाले फ्यूल सेल में इस्तेमाल के स्थान पर मुख्य रूप से बिजली, पानी और गर्मी पैदा होती है।
हाइड्रोजन फ्यूल सेल वाली गाड़ी में हाइड्रोजन को टैंक में रखा जाता है। यह हाइड्रोजन फ्यूल सेल तक पहुंचता है और वहां बिजली बनता है। यह बिजली गाड़ी की इलेक्ट्रिक मोटर को चलाती है और मोटर पहियों को घुमाती है। इसलिए ऐसी गाड़ी में पेट्रोल या डीजल इंजन की जगह फ्यूल सेल और इलेक्ट्रिक मोटर का इस्तेमाल किया जाता है।
भारत सरकार हाइड्रोजन से चलने वाले वाहनों को लेकर लगातार काम कर रही है। नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत 2026 में 21 मार्गों पर 70 हाइड्रोजन से चलने वाले वाहनों के 12 पायलट प्रोजेक्ट को मंजूरी दी गई। इनके साथ 16 हाइड्रोजन भरने वाले सेंटर यानी हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग स्टेशन भी शामिल हैं।
इन प्रोजेक्ट में मध्य प्रदेश से जुड़े कुछ मार्ग हैं, जैसे बीना-गुना-बीना और बीना-भोपाल-बीना। इसके अलावा बीना-झांसी-बीना और बीना-सांची, स्तूप-बीना मार्ग भी इस योजना में शामिल हैं।
अगर फ्यूल सेल में शुद्ध हाइड्रोजन का इस्तेमाल किया जाता है, तो फ्यूल सेल के अंदर होने वाली प्रक्रिया में पेट्रोल-डीजल इंजन की तरह कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं होता। लेकिन हर हाइड्रोजन ग्रीन हाइड्रोजन नहीं होता। हाइड्रोजन रेडीमेड नहीं मिलता है, इसे बनाया जाता है। इसके लिए जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल होता है।
रिफाइनरी, उर्वरक और इस्पात जैसे उद्योगों में भी ग्रीन हाइड्रोजन के इस्तेमाल की संभावनाओं पर काम हो रहा है। सरकार का लक्ष्य भारत को ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन, इस्तेमाल और निर्यात का बड़ा केंद्र बनाना है।