

सीमा कुमारी
नई दिल्ली: हर साल भाद्र मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि, यानी 'रक्षा बंधन' के तीन दिन बाद 'कजरी तीज' (Kajari Teej 2023 ) मनाई जाती है। इस साल यह पावन तिथि 2 सितंबर, दिन शनिवार को रखा जाएगा। इसे 'बूढ़ी तीज', 'सातुड़ी तीज' जैसे नामों से भी जाना जाता है। यह त्यौहार उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।
'हरियाली तीज' और 'हरितालिका तीज' की तरह 'कजरी तीज' भी अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए रखा जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र के लिए दिन भर निर्जला व्रत रखती हैं, और 'करवाचौथ' की तरह शाम के समय चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण करती हैं। इस दिन शिव जी और माता पार्वती की पूजा की जाती है। मान्यता है कि, 'कजरी तीज' के दिन विधि पूर्वक पूजा करने से भगवान शिव और माता पार्वती प्रसन्न होते हैं।आइए जानें, साल 2023 में कब है 'कजरी तीज व्रत'। इसके मुहूर्त, महत्व और पूजा विधि भी जानें,
इस साल कजरी तीज 2 सितंबर 2023 को मनाई जाएगी। इसे बड़ी तीज के नाम से भी जाना जाता है। 'कजरी तीज' में स्त्रियां शिव-शक्ति की पूजा कर नीमड़ी माता की आराधना करती हैं।
पंचांग के अनुसार, भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि 1 सितंबर 2023 को रात 11 बजकर 50 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन 2 सितंबर 2023 को रात 8 बजकर 49 मिनट पर इसका समापन होगा ।
सुबह 7:57 - सुबह 9:31
रात 9:45 - रात 11:12
कजरी तीज व्रत वाले दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं।
इसके बाद पूजा स्थल को साफ करके वहां एक चौकी पर लाल रंग या पीले रंग का वस्त्र बिछाएं।
माता पार्वती और भगवान शिव की मूर्ति स्थापित करें। यह मूर्ति वह मिट्टी से स्वयं बना सकती हैं, या फिर बाजार से लाकर स्थापित कर सकती हैं।
इसके बाद वे शिव-गौरी का विधि-विधान से पूजन करें, जिसमें वह माता गौरी को सुहाग के 16 सामग्री अर्पित करें।
भगवान शिव को बेलपत्र, गाय का दूध, गंगा जल और धतूरा अर्पित करें।
इसके बाद शिव-गौरी के विवाह की कथा सुनें।
रात्रि में चंद्रोदय होने पर पूजा करें और हाथ में चांदी की अंगूठी और गेहूं के दाने लेकर चंद्रदेव को जल का अर्घ्य दें।
पूजा समाप्त होने के बाद किसी सौभाग्यवती स्त्री को सुहाग की वस्तुएं दान करके उनका आशीर्वाद लें और व्रत खोलें।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कजरी तीज का व्रत सबसे पहले माता पार्वती ने रखा था। ऐसी मान्यता है कि, इस व्रत को करने से दांपत्य जीवन में प्रेम, सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। साथ ही, कुंवारी कन्याओं को मनचाहे वर (मनचाहा वर उपाय) प्राप्ति हो सकती है। साथ ही, दांपत्य जीवन में कलह-क्लेश दूर हो सकती है। इस व्रत को करने से संतान की खुशहाली का आशीर्वाद भी मिलता है। इस दिन रात्रि में चांद की पूजा की जाती है और हाथ में गेहूं के दाने और जल लेकर चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है।