पहली बार ‘वट सावित्री व्रत’ कर रहीं सुहागनें ये बातें जान लें, इन नियमों से करें पूजा-पाठ
- Written By: नवभारत डेस्क
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-सीमा कुमारी
सनातन हिंदू धर्म में हर व्रत और त्योहार का अपना अलग ही महत्व है। अखंड सौभाग्य का प्रतीक ‘वट सावित्री’ (Vat Savitri Vrat) का पावन व्रत इस वर्ष 30 मई, सोमवार को है। इसी दिन ‘सोमवती अमावस्या’ भी है। हर साल ‘वट सावित्री व्रत’ (Vat Savitri Vrat) ‘ज्येष्ठ अमावस्या’ के दिन रखा जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करके अपने पति की दीर्घायु के लिए भगवान विष्णु के साथ मां लक्ष्मी और वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की विधि-विधान से पूजा करती हैं।
बरगद के पेड़ को चिरंजीवी कहा जाता है। क्योंकि, इस पर ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों देवों का वास होता है। ऐसी मान्यता है कि, इस पर हर वक्त माता लक्ष्मी का निवास रहता है। इसलिए बरगद के वृक्ष की पूजा करने पर कष्टमुक्त, रोगमुक्त, भयमुक्त होने के साथ-साथ पति की लंबी उम्र का वरदान प्राप्त किया जा सकता है। जिससे घर में सुख शांति बनी रहती है। गृह-क्लेश की संभावना कम हो जाती है। सुहागिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करके टोकरी में सामान लेकर नजदीक में किसी बरगद वृक्ष के पास जाकर विधिवत उसकी पूजा अर्चना करती हैं और उस पर जल चढ़ाती हैं। आइए जानें पहली बार व्रत रख रही महिलाओं के लिए वट सावित्री व्रत के नियमों के बारे में-
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पूजा सामग्री
सुहागिन महिलाएं टोकरी में सुहाग का सारा सामान, कच्चा सूत, रोली, चंदन, अक्षत, घर से बना मीठा पकवान, फल, फूल, मिट्टी का दिया, भीगा चना, मिठाई, खरबूजा, जल से भरा कलश लेकर नजदीक में बरगद के पेड़ के पास जाकर उसकी परिक्रमा करती हैं और पूजा करती हैं।
पूजा-विधि
सुहागिन महिलाएं सुबह सुबह स्नान करके, सोलह श्रृंगार करके, अपना सारा सामान टोकरी में लेकर, बरगद वृक्ष के पास जाकर बरगद के पेड़ में रोली और चंदन का तिलक लगाएं। कच्चा सूत बांधकर पांच से सात बार बरगद के पेड़ की परिक्रमा करें। बरगद के पेड़ पर फल, फूल, मिष्ठान, घर से बना हुआ पकवान चढ़ाकर अपने पति की लंबी उम्र की प्रार्थना करें। जल से भरे कलश से बरगद के पेड़ को सिंचित करें। सत्यवान और सावित्री की कथा सुनने अथवा सुनाएं। पूर्ण निष्ठा और भक्ति भाव से बरगद के वृक्ष की परिक्रमा करते हुए अपने पति की लंबी आयु की कामना करें।
