

Jharkhand Student Protest: झारखंड में सिविल सर्विसेज और कर्मचारी चयन आयोग (SSC) की परीक्षाओं में कथित धांधली और भ्रष्टाचार के खिलाफ छात्र संगठन पिछले 16 दिनों से धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। इस दौरान सरकार और छात्रों के बीत तीन दौर की वार्ता हो चुकी है इसके बाद भी सरकार इस विरोध प्रदर्शन को खत्म नहीं करवा पाई है। आज, 10 अगस्त का छात्रों ने विधानसभा घेरने का ऐलान किया है।
आंदोलन के केंद्र में छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो समेत पांच लोग हैं, जो अपनी मांगों को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं। छात्रों का कहना है कि जब तक सरकार सभी मांगें नहीं मानेगी, आंदोलन जारी रहेगा। ऐसे में सवाल उठता है कि झारखंड सरकार अब तक छात्रों के प्रदर्शन को क्यों खत्म नहीं करा पाई है? छात्रों और सरकार के बीच किन मुद्दों को लेकर असहमति है?
झारखंड में जारी छात्र आंदोलन की अगुवाई 33 वर्षीय छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो कर रहे हैं। उन्होंने 2 अगस्त से अन्न त्याग दिया है। बताया गया कि कुछ दिनों तक उन्होंने पानी भी नहीं लिया। इसके कारण उनकी तबियत लगातार बिगड़ रही है और उनका ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर काफी नीचे चला गया। देवेंद्र नाथ के साथ राहुल, रुपेश, सविता और हबीबा भी अनशन कर रहे हैं। मेडिकल टीम लगातार प्रदर्शनकारी छात्रों की स्थिति पर नजर बनाए हुए है।
भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों की अपनी अलग-अलग शिकायतें हैं। जैसे राहुल ने 2016 में टीजीटी परीक्षा पास की थी, लेकिन हाई कोर्ट के आदेश के बावजूद उन्हें नौकरी नहीं मिली। इसी प्रकार रुपेश का आरोप है कि SSC CGL परीक्षा में उन्हें 83 प्रतिशत अंक मिले, फिर भी परिणाम जारी नहीं किया गया। रुपेश ने दावा किया कि उनसे कम नंबर पाने वाले अभ्यार्थियों का चयन हुआ है। सविता ने उत्पाद सिपाही भर्ती की शारीरिक परीक्षा पास की थी। वहीं हबीबा ने 2017 में पंचायत सचिव की परीक्षा पास की थी, लेकिन उम्र सीमा में केवल एक दिन की कमी के कारण उन्हें बाहर कर दिया गया।
झारखंड में आंदोलन करने वाले छात्रों का आरोप है कि राज्य में सरकारी नौकरी की परीक्षाओं में भारी गड़बड़ियां हुई हैं। छात्रों ने एक वायरल हो रही ओएमआर शीट का भी हवाला दिया। उनका दावा है कि 100 में से सिर्फ 48 प्रश्नों के जवाब देने वाले अभ्यर्थी को भी परीक्षा में पास कर दिया गया। छात्रों का आरोप है कि इससे परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। छात्र चाहते हैं कि इनकी सीबीई से निष्पक्ष जांच कराई जाए। वहीं, सरकार सीबीई की जगह सीआईडी जांच की पक्षधर है। इसके चलते छात्रों और सरकार के बीच गतिरोध बना हुआ है।
झारखंड में सिविल सर्विसेज और कर्मचारी चयन आयोग (SSC) जैसी बड़ी सरकारी परीक्षाओं के आयोजन की जिम्मेदारी लखनऊ बेस कपंनी टेक्नोक्रेटिक डायनेमोस प्राइवेट लिमिटेड (TDPL) के पास था। छात्रों ने TDPL पर भी सवाल उठाए हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पहले गड़बड़ी के आरोपों के चलते TDPL को ब्लैकलिस्ट किया गया था। इसके बावजूद उसे परीक्षा कराने की जिम्मेदारी दी गई।
विवाद बढ़ने के बाद JPSC के तत्कालीन चेयरमैन एल. खियांगते ने इस्तीफा दे दिया था। हालांकि छात्रों का कहना है कि केवल कुछ लोगों की गिरफ्तारी से मामला खत्म नहीं होगा। वे पूरी परीक्षा प्रक्रिया की जांच और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई चाहते हैं।
छात्रों ने सरकार के सामने तीन प्रमुख मांगें रखी हैं-
पहली: 14वीं JPSC प्रारंभिक परीक्षा को पूरी तरह रद्द किया जाए और मामले की जांच राज्य की CID के बजाय CBI या ED जैसी केंद्रीय एजेंसी से कराई जाए।
दूसरी: TDPL एजेंसी से जुड़ी है। छात्र चाहते हैं कि इस एजेंसी द्वारा आयोजित सभी परीक्षाओं को रद्द किया जाए और उसे पूरी तरह ब्लैकलिस्ट किया जाए।
तीसरी: JPSC और JSSC में भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारियों को हटाने तथा मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की है।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आंदोलनकारी छात्रों से बातचीत के लिए चार मंत्रियों की उच्चस्तरीय समिति बनाई है। इसमें सुदिव्य कुमार सोनू, चमरा लिंडा, दीपिका सिंह पांडे और संजय यादव शामिल हैं। सरकार और छात्रों के बीच अब तक तीन दौर की बातचीत हो चुकी है। 9 अगस्त को हुई तीसरे दौर की वार्ता में सरकार ने 14वीं JPSC PT परीक्षा रद्द करने पर सहमति जताई।
सरकार द्वारा अपनी कुछ मांगों को माने जाने छात्र खुश है और इसे अपनी आधी जीत मान रहे हैं। लेकिन वे अभी भी प्रदर्शन खत्म करने को तैयार नहीं है। छात्रों का कहना है कि केवल परीक्षा रद्द करना पर्याप्त नहीं है। जब तक बाकी मांगों पर ठोस फैसला नहीं होता, भूख हड़ताल जारी रहेगी। आंदोलनकारियों ने 10 अगस्त को विधानसभा घेराव का आह्वान किया है। इससे प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती बढ़ गई है। छात्रों का आंदोलन अब केवल परीक्षा रद्द करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही का मुद्दा भी बन गया है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सरकारी नौकरी की परीक्षाओं में युवाओं का भरोसा बहाल करना सरकार की जिम्मेदारी है।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती JPSC की संवैधानिक स्थिति को लेकर है। JPSC एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है, इसलिए मुख्यमंत्री सीधे उसके फैसलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। बिना ठोस जांच रिपोर्ट के परीक्षा रद्द करने का फैसला अदालत में चुनौती दिया जा सकता है। चयनित अभ्यर्थी भी कानूनी रास्ता अपना सकते हैं। ऐसे में सरकार को छात्रों की मांग और कानूनी प्रक्रिया के बीच संतुलन बनाना होगा।