महाकाल मंदिर में VIP दर्शन पर रोक वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज, जानें क्या कहा

VIP Darshan Mahakaleshwar Temple: सुप्रीम कोर्ट ने उज्जैन के महाकाल मंदिर में भेदभाव का आरोप लगाने वाली उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें वीआईपी दर्शन पर रोक लगाने की मांग की गई थी।
vip darshan in Will the UGC's new rules be stayed? A crucial hearing will be held in the Supreme Court today
सुप्रीम कोर्ट (सोर्सः सोशल मीडिया)
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Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर में कथित भेदभाव को लेकर दायर याचिका को खारिज कर दिया है। इस याचिका में वीआईपी दर्शन पर रोक लगाने और सभी श्रद्धालुओं को समान अवसर देने की मांग की गई थी। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) की अगुआई वाली पीठ ने स्पष्ट कहा कि इस तरह की याचिकाएं दाखिल करने वाले लोग वास्तविक श्रद्धालु नहीं होते, बल्कि इनके पीछे कोई और उद्देश्य होता है। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में नीति या दिशा-निर्देश बनाना कोर्ट का काम नहीं है।

याचिकाकर्ता दर्पण अवस्थी की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कड़ी टिप्पणी की। CJI ने कहा, “ये लोग श्रद्धालु नहीं हैं। हम इस पर और कुछ कहना नहीं चाहते। इनका मकसद कुछ और होता है। क्या किया जाना चाहिए और क्या नहीं, यह तय करना अदालत का कार्य नहीं है। हम न्यायिक प्रक्रिया तक ही सीमित हैं।” याचिकाकर्ता के वकील की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी, हालांकि याची को सरकार और प्रशासन के समक्ष आवेदन देने की छूट दी गई।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि गर्भगृह में प्रवेश को लेकर एक समान नीति होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है और सभी नागरिकों के लिए समान नियम लागू होने चाहिए। उनका तर्क था कि वीआईपी दर्जे के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। यदि किसी को कलेक्टर की सिफारिश पर गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति मिलती है, तो आम श्रद्धालुओं को भी देवता को जल अर्पित करने का अधिकार मिलना चाहिए।

पहले हाई कोर्ट से भी मिल चुकी थी निराशा

इससे पहले दर्पण अवस्थी ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में भी याचिका दायर की थी। उन्होंने वीआईपी श्रद्धालुओं को गर्भगृह में जाकर जल चढ़ाने की अनुमति और आम श्रद्धालुओं को इससे वंचित रखने को भेदभावपूर्ण बताते हुए इस व्यवस्था पर रोक लगाने की मांग की थी। हालांकि हाई कोर्ट से राहत न मिलने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, जहां अब उनकी याचिका खारिज कर दी गई है।

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