Explainer: वंदे मातरम् पर क्यों नहीं थम रहा सियासी विवाद, जानिए जिन्ना के खत और कांग्रेस के फैसले का सच

Vande Mataram Controversy: 150 साल पुराने राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' को लेकर देश में सियासत गर्म है। सोनिया गांधी की वायरल क्लिप से छिड़े ताजा विवाद के पीछे की पूरी ऐतिहासिक कहानी जानिए।
Vande Mataram Controversy
वंदे मातरम को लेकर विवाद(AI जनरेटेड इमेज)
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Vande Mataram Congress Controversy: राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को लेकर इन दिनों पूरे देश में सियासी माहौल गर्म है। पक्ष और विपक्ष दोनों खुद को सही साबित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा 150 साल पहले लिखे वंदे मातरम् को लेकर राजनीतिक विवाद नया नहीं है। बल्कि आजादी से पहले भी इसे लेकर भंयकर विवाद हो चुका है।

अब यह विवाद सालों एक बाद फिर से अपने चरम है, ताजा विवाद तब शुरू हुआ जब हाल ही में 15 अगस्त को दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यलाय में आजादी के 80वीं वर्षगांठ के मौके पर तिरंगा फहराया गया। इस दौरान कांगेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, सोनिया गांधी, राहुल गांधी समेत पार्टी कई बड़े नेता मौजूद थे। इस दौरान राष्ट्रीय गान जन-गण-मन के साथ राष्ट्रगीत वंदे मातरम् भी गाया गया। लेकिन सोनिया गांधी ने इसे बीच में रोक दिया। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने इसे आड़े हाथों लिया और इसे राष्ट्रगीत अपमान बताकर सोनिया गांधी से मांफी मांगने की अपील की। वहीं कांग्रेस ने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि कांग्रेस नेता ने कुछ भी गलत नहीं किया। आइए आपको बताते हैं कि वंदे मातरम् को सारा विवाद क्या है? इससे पहले कब-कब इसे लेकर सियासी पारा गर्म हो चुका है? 

क्या है वंदे मातरम् का इतिहास? 

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1875 को वंदे मातरम् की रचना की थी। लेकिन इसे असली प्रसिद्धी तब मिली जब 1882 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इसे अपनी सबसे चर्चित उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया। इस गीत में भारत माता की कल्पना देवी दुर्गा के रूप में की गई है। गीत का मूल भाव मातृभूमि के प्रति प्रेम और विदेशी शासन के खिलाफ संघर्ष की भावना से जुड़ा था। धीरे धीरे यह आजादी के आंदोलन की पहचान बन गया।

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वंदे मातरम के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय(सोर्स- सोशल मीडिया)

1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पहली बार सार्वजनिक रूप से वंदे मातरम् प्रस्तुत किया। इसके बाद गीत की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध के दौरान आंदोलनकारियों के बीच यह गीत बेहद लोकप्रिय हुआ। ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रदर्शन और आंदोलनों में वंदे मातरम् एक प्रमुख नारा और गीत बन गया। अंग्रेजी शासन ने इसके बढ़ते प्रभाव को देखते हुए 1907 में इसके गायन पर रोक लगा दी।

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रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 1896 में पहली वंदे मातरम् प्रस्तुत किया था(सोर्स- सोशल मीडिया)

वंदे मातरम् को लेकर सबसे बड़ा विवाद 1937 में जुड़ा। तब देशभर में आजादी का आंदोलन अपने चरम पर था। मुस्लिम लीग की आपत्ति के चलते कांग्रेस ने इसके केवल शुरुआती दो अंतरों को गाने का फैसला किया। जो आज भी विवाद का कारण बना हुआ है।

मुस्लिम लीग ने क्यों किया विरोध

वंदे मातरम् को लेकर मुस्लिम लीग की आपत्ति बाद के वर्षों में सामने आई। जानकारी के मुताबिक मुस्लिम लीग ने वंदे मातरम् को पहला विरोध 1909 में अमृतसर अधिवेशन के दौरान किया था। लीग ने इस गीत को सांप्रदायिक और इस्लाम विरोधी बताते हुए इसका विरोध किया। लीग का तर्क था कि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी अन्य के प्रति धार्मिक भक्ति या उपासना की अनुमति नहीं है। गीत में भारत माता को देवी के रूप में दिखाए जाने को लेकर भी आपत्ति जताई गई थी।

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मुस्लिम लीग ने 1907 के कांग्रेस अधिवेशन में किया था वंदे मातरम का विराध(सोर्स- सोशल मीडिया)

इस विरोध के चलते कांग्रेस के सामने मुश्किल स्थिति पैदा हो गई। उस समय स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे बड़ा लक्ष्य अंग्रेजी शासन के खिलाफ हिंदू और मुस्लिम समाज को एकजुट रखना था। कांग्रेस के सामने यह सवाल था कि वंदे मातरम् जैसे लोकप्रिय राष्ट्रवादी गीत की परंपरा को बनाए रखा जाए या मुस्लिम समाज के एक वर्ग की आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए कोई रास्ता निकाला जाए। इसी विवाद ने आगे चलकर बड़ा राजनीतिक रूप लिया।

1937 में कांग्रेस ने लिया बड़ा फैसला

1937 में प्रांतीय चुनावों के बाद कांग्रेस कई प्रांतों में सत्ता में आई। इसी दौर में वंदे मातरम् को लेकर मुस्लिम लीग का विरोध तेज हुआ। तब अक्टूबर 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने इस विवाद का समाधान खोजने के लिए मौलाना अबुल कलाम आजाद जवाहरलाल नेहरू सुभाष चंद्र बोस और आचार्य नरेंद्र देव की चार सदस्यीय समिति बनाई। समिति को गीत के इस्तेमाल को लेकर रास्ता सुझाने की जिम्मेदारी दी गई थी।

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कांग्रेस समिति ने दिया था पहले दो अंतरों को गाने का प्रस्ताव(सोर्स- सोशल मीडिया)

समिति ने वंदे मातरम् के शुरुआती दो अंतरों को स्वीकार करने का सुझाव दिया। इन दो अंतरों में धार्मिक संदर्भ अपेक्षाकृत कम माने गए। 28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में इस फैसले का समर्थन किया गया। इस बैठक में महात्मा गांधी जवाहरलाल नेहरू सरदार वल्लभभाई पटेल सुभाष चंद्र बोस राजेंद्र प्रसाद मौलाना अबुल कलाम आजाद और कई अन्य प्रमुख नेता मौजूद थे। हालांकि कांग्रेस के इस फैसले से मुस्लिम लीग की आपत्तियां खत्म नहीं हुईं। 

जिन्ना ने नेहरू को लिखा था पत्र 

मोहम्मद अली जिन्ना और लीग का रुख था कि सार्वजनिक और राष्ट्रीय जीवन में वंदे मातरम् को ही नहीं रखा जाना चाहिए। 1938 को मोहम्मद अली जिन्ना ने जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर वंदे मातरम् को पूरी तरह छोड़ने की मांग की। दूसरी तरफ गीत के समर्थकों ने कांग्रेस के फैसले को मुस्लिम तुष्टीकरण से जोड़कर देखा।विरोध करने वालों का तर्क था कि आनंदमठ में मुस्लिम विरोधी संदर्भ मौजूद हैं। वहीं बंकिम चंद्र के साहित्य पर काम करने वाले कई लोगों ने इस आरोप को खारिज किया ।

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जिन्ना नेहरू को चिट्ठी लिखकर जताया था विरोध(सोर्स- सोशल मीडिया)

संविधान सभा में भी उठा सवाल

आजादी के बाद वंदे मातरम् और जन गण मन की भूमिका को लेकर भी बहस हुई। संविधान सभा में राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान के सवाल पर कई सदस्यों ने अपनी राय रखी। सेठ गोविंद दास ने जन गण मन को राष्ट्रगान बनाए जाने को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने वंदे मातरम् को भी राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण स्थान देने की मांग की। इस विषय पर संविधान सभा में अलग अलग समय पर चर्चा होती रही।

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संविधान सभा में भी हुआ था विवाद(सोर्स- सोशल मीडिया)

24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने जन गण मन को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किए जाने की घोषणा की। इसी मौके पर उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले वंदे मातरम् को जन गण मन के बराबर सम्मान दिया जाएगा। इसके बाद वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत के रूप में विशेष स्थान मिला। हालांकि इसके पूर्ण गायन को लेकर पुराना विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।

2026 में फिर शुरू हुआ विवाद

वंदे मातरम् की रचना के 150 वर्ष पूरे होने के मौके पर केंद्र सरकार की ओर से आधिकारिक कार्यक्रमों में इसके पूर्ण संस्करण के गायन और वादन को लेकर प्रोटोकॉल की बात सामने आई। इसी बीच 2026 में वंदे मातरम् को लेकर राजनीतिक बहस फिर तेज हो गई। विवाद केवल गीत के गायन तक सीमित नहीं रहा बल्कि इसके इतिहास और आजादी के आंदोलन में इसकी भूमिका को लेकर भी भाजपा और कांग्रेस आमने सामने आ गए।

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सोनिया गांधी ने दो अंतरों के बाद रोक दिया था गान(सोर्स- सोशल मीडिया)

15 अगस्त 2026 को दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम् के गायन के दौरान सोनिया गांधी की प्रतिक्रिया को लेकर भी भाजपा ने कांग्रेस पर निशाना साधा। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि कांग्रेस आज भी वंदे मातरम् को लेकर पुराने रुख पर कायम है। इसके बाद कांग्रेस के भीतर भी इस मुद्दे पर स्थिति स्पष्ट करने की जरूरत महसूस हुई। 19 अगस्त को कांग्रेस कार्यसमिति ने अपना रुख साफ कर दिया।

विवाद आगे भी जारी रहने के आसार

भाजपा ने कांग्रेस के इस फैसले पर तीखा हमला किया। गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के रुख की आलोचना की। भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने भी कांग्रेस पर वंदे मातरम् के अपमान को संस्थागत रूप देने का आरोप लगाया। भाजपा नेताओं ने कांग्रेस के 1937 के फैसले को मुस्लिम लीग के दबाव से जोड़ते हुए कहा कि कांग्रेस ने राष्ट्रवादी भावना से जुड़े गीत के साथ न्याय नहीं किया।

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वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पहले कांग्रेस के 1937 के फैसले की आलोचना कर चुके हैं। दिसंबर 2025 में संसद में वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर चर्चा के दौरान उन्होंने कांग्रेस पर मुस्लिम लीग के दबाव में झुकने और तुष्टीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाया था। कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज किया है। पार्टी का कहना है कि स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की भूमिका को लेकर उसका योगदान ऐतिहासिक रहा है।

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