वंदे मातरम के शुरुआती दो पैरा ही गाएगी कांग्रेस, 1937 के उस फैसले की पूरी कहानी जानिए

Vande Mataram Row: वंदे मातरम् विवाद के बीच कांग्रेस CWC ने 1937 का फैसला दोहराते हुए पार्टी कार्यक्रमों में सिर्फ पहले दो छंद गाने का निर्णय लिया। जानिए इसके पीछे की पूरी ऐतिहासिक वजह।
Congress on Vande Mataram Row
CWC मीटिंग में सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खरगेX/@mallikarjunkharge
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Congress on Vande Mataram Row: वंदे मातरम् को लेकर जारी राजनीतिक बहस के बीच कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) ने पार्टी के पुराने रुख को दोहराते हुए फैसला किया है कि कांग्रेस के कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत के केवल पहले दो छंद ही गाए जाएंगे। बुधवार को हुई CWC की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई और नेताओं ने 1937 में पार्टी की ओर से लिए गए फैसले का हवाला दिया।

कांग्रेस के मुताबिक, उसका मौजूदा फैसला अक्टूबर 1937 में राष्ट्रीय परिषद द्वारा पारित प्रस्ताव पर आधारित है। उस समय तय किया गया था कि राष्ट्रीय और सार्वजनिक सभाओं में ‘वंदे मातरम्’ के केवल शुरुआती दो छंद गाए जाएंगे।

भाजपा की आलोचना के बाद फिर गरमाया विवाद

कांग्रेस का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब भाजपा ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा दक्षिण गोवा की एक सभा में वंदे मातरम् के कथित ‘अधूरे’ संस्करण के गायन को लेकर सवाल उठाए थे।

खरगे ने अपने बचाव में कहा था कि उन्होंने वही वंदे मातरम् गाया है, जिसे महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं ने गाया था। उन्होंने भाजपा पर कांग्रेस के ऐतिहासिक फैसलों की जानकारी नहीं होने का आरोप लगाया।

खरगे ने कहा कि कांग्रेस ने उनके जन्म से पहले ही राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान को लेकर अपना रुख स्पष्ट कर दिया था और वह पिछले करीब 80 वर्षों से चली आ रही परंपरा के मुताबिक ही चल रहे हैं।

कांग्रेस सिर्फ दो छंद क्यों गाती है?

इस फैसले की जड़ 1937 के कांग्रेस के निर्णय में है। दरअसल, वंदे मातरम् के पूरे संस्करण को लेकर उस समय भी बहस हुई थी। चर्चा का प्रमुख मुद्दा यह था कि अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले लोगों वाली राष्ट्रीय सभाओं में गीत के सभी छंदों का इस्तेमाल किस तरह किया जाए।

‘वंदे मातरम्’ की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। बाद में इसे उनके उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया। गीत के शुरुआती दो छंदों में मातृभूमि की स्तुति की गई है, जबकि बाद के हिस्सों में धार्मिक और पौराणिक प्रतीकों का उल्लेख आता है।

इसी वजह से कांग्रेस ने सार्वजनिक और राष्ट्रीय कार्यक्रमों के लिए शुरुआती दो छंदों को उपयुक्त माना।

टैगोर से भी लिया गया था सुझाव

कांग्रेस के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, 1937 में इस मुद्दे पर रवींद्रनाथ टैगोर से भी सलाह ली गई थी। जवाहरलाल नेहरू को लिखे उनके पत्र में टैगोर ने शुरुआती दो छंदों को व्यापक और समावेशी राष्ट्रीय गीत के रूप में उपयुक्त माना था।

वहीं, बाद के छंदों में मौजूद धार्मिक संदर्भों को उन्होंने ऐसी राष्ट्रीय सभाओं के लिए अनुपयुक्त माना, जिनमें विभिन्न समुदायों के लोग शामिल होते हैं।

इसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने सार्वजनिक और राष्ट्रीय सभाओं में केवल पहले दो छंद गाने की सिफारिश की थी। 1937 के इस निर्णय में आयोजकों को वंदे मातरम् के साथ या उसके स्थान पर अन्य उपयुक्त राष्ट्रीय गीत शामिल करने की स्वतंत्रता भी दी गई थी।

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विवाद के बीच कांग्रेस ने पुराना रुख दोहराया

CWC के ताजा फैसले से साफ है कि कांग्रेस ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो छंदों के इस्तेमाल को लेकर अपने 1937 के ऐतिहासिक रुख पर कायम है। पार्टी का तर्क है कि यह कोई नया फैसला नहीं, बल्कि दशकों पहले तय की गई नीति की ही पुनर्पुष्टि है।

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