तमिलनाडु में NEET खत्म करने का प्रस्ताव पास, जानें क्यों लगातार परीक्षा का विरोध कर रहा राज्य

NEET Exam: तमिलनाडु विधानसभा ने NEET परीक्षा को खत्म करने की मांग वाले प्रस्ताव को एक बार फिर मंजूरी दे दी है। राज्य सरकार लंबे समय से NEET को सामाजिक न्याय और राज्य के अधिकारों के खिलाफ बताती रही है।
Tamil Nadu Assembly Has Approved The Abolition NEET Exam
तमिलनाडु विधानसभा ने NEET परीक्षा को खत्म करने की मंजूरी दे दी है।सोर्स- सोशल मीडिया
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Tamil Nadu Passes proposal Abolish NEET Exam: देशभर में NEET पेपर लीक के बाद इस परीक्षा को लेकर अनेक तरह के सवाल उठने लगे थे। कई राज्यों में छात्रों ने बड़ी संख्या में आंदोलन भी किए थे। जिसके बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा था। इसी बीच नीट परीक्षा को लेकर सबसे ज्यादा सवाल उठाने जाने वाले राज्यों में एक बार फिर तमिलनाडु का नाम शामिल था।

बता दें कि तमिलनाडु पिछले कई वर्षों से NEET परीक्षा का विरोध कर रहा है। वहीं एक बार फिर राज्य में नीट परीक्षा को पूर्ण रूप से खत्म करने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली है। तमिलनाडु के स्वास्थ्य मंत्री केजी अरुणराज ने नीट खत्म करने के मुद्दे पर राज्य विधानसभा में प्रस्ताव पेश किया, जिसके बाद इसे पारित किया गया।

CM विजय ने भी किया है NEET का विरोध

नीट पेपर लीक के बाद मुख्यमंत्री विजय जोसेफ (थालापति विजय ने ) इस परीक्षा का कड़ा विरोध दर्ज किया था। उनका कहना है कि इस परीक्षा से गरीब छात्रों को बड़ा नुकसान हो रहा है।

उन्होंने आगे कहा की तमिलनाडु में 12 वीं के अंको पर नीटआधार पर नीट मेडिकल की पढाई के लिए सीटें मिलनी चाहिए। सीएम का राज्य सरकार से कहना है कि सरकार को यह छुट दी जानी चाहिए की वे अपनी सरकरी मेडिकल सीटों पर राज्य के मेघावी छात्रों को सीधे प्रवेश दे सके।

NEET परीक्षा को खत्म करने की वजह

विधानसभा में मंत्री अरुणराज मे नीट के विरोध में प्रस्ताव पेश करते हुए कहा कि नीट परीक्षा ने शिक्षा को केवल कोचिंग सेंटरों तक सीमित कर दिया है, जिससे ग्रामीण और सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। तमिलनाडु सरकार लगातार जोर देती आ रही है की नीट की परीक्षा सामाजिक न्याय, राज्यों के खिलाफ है।

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तमिलनाडु में क्यों किया जाता है NEET का विरोध

दरअसल तमिलनाडु में बाकी राज्यों की तरह पहले 12वीं के नंबरों के आधार पर मेडिकल में सीट मिल जाती थी। इसी समय अनीता नाम की एक गरीब छात्रा ने 12वीं की बोर्ड परीक्षा में 98% अंक हासिल किए थे, लेकिन नीट परीक्षा अनिवार्य होने के कारण उसे सरकारी मेडिकल सीट नहीं मिल पाई।

यह मामला अदालत तक भी पहुंचा, लेकिन इस संघर्ष के बीच एक दिहाड़ी मजदूर पिता की बेटी का डॉक्टर बनने का सपना अधूरा रह गया। अपने सपनों को टूटता देख अनीता ने आत्महत्या कर ली, जिसके बाद पूरे तमिलनाडु में बड़े पैमाने पर हिंसक प्रदर्शन हुए और नीट के खिलाफ एक मजबूत राजनीतिक व सामाजिक माहौल बन गया।

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