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Right to Die with Dignity: भारत में इच्छामृत्यु के मुद्दे पर दशकों से बहस चल रही है, लेकिन हाल ही में गाजियाबाद के हरीश राणा के मामले ने इस चर्चा को फिर से तेज कर दिया है। 32 वर्षीय हरीश पिछले 13 सालों से बिस्तर पर एक ‘जिंदा लाश’ की तरह पड़े हैं और उनके पिता ने सुप्रीम कोर्ट से अपने बेटे के लिए ‘सम्मान के साथ मौत’ की मांग की है।
यह मामला हमें भारत की उस ऐतिहासिक कानूनी सफर की याद दिलाता है, जिसकी शुरुआत मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग के साथ हुई थी। आइए जानते हैं क्या था ये मामला और पूरी टाइमलाइन।
इच्छामृत्यु की बहस अरुणा शानबाग के जिक्र के बिना अधूरी है। अरुणा मुंबई के केईएम अस्पताल में एक समर्पित नर्स थीं। 27 नवंबर 1973 की रात, अस्पताल के ही एक वार्ड ब्वॉय सोहनलाल वाल्मीकि ने उन पर हमला किया। उसने अरुणा का गला कुत्ते बांधने वाली लोहे की चेन से इतनी जोर से कसा कि उनके मस्तिष्क तक ऑक्सीजन की सप्लाई रुक गई।
अगले दिन जब वे मिलीं, तो उनका दिमाग पूरी तरह डैमेज हो चुका था और वे पर्मानेंट वेजिटेटिव स्टेट (PVS) में चली गई थीं- यानी शरीर जिंदा था, लेकिन चेतना खत्म हो चुकी थी। अरुणा अगले 42 सालों तक अस्पताल के उसी वार्ड नंबर 4 के बिस्तर पर पड़ी रहीं। इस दौरान केईएम अस्पताल की नर्सों ने अपनी बहन मानकर उनकी देखभाल की, जो पूरी दुनिया के लिए इंसानियत की एक मिसाल बनी।
साल 2009 में मानवाधिकार कार्यकर्ता पिंकी विरानी ने उनके लिए इच्छामृत्यु की याचिका दाखिल की, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वे भोजन ले रही हैं और पूरी तरह ‘मृत’ नहीं हैं। हालांकि, इसी केस ने भारत में ‘पैसिव यूथेनेशिया’ के लिए कानूनी दरवाजे खोल दिए। अरुणा को इच्छामृत्यु तो नहीं मिल पाई लोकिन 18 मई 2015 को निमोनिया के कारण अरुणा ने 42 साल के लंबे संघर्ष के बाद अंतिम सांस ली। अब जानते हैं हरीश राणा के बारे में।
हरीश राणा की जिंदगी साल 2013 में हुए एक हादसे के बाद पूरी तरह बदल गई थी। वे ‘क्वाड्रिप्लेजिया’ नाम की गंभीर बीमारी से पीड़ित हो गए, जिसके कारण उनके हाथ-पैर और शरीर के पूरे हिस्से ने काम करना बंद कर दिया।
पिछले 13 साल से हरीश बिस्तर पर लगभग बेहोश अवस्था में हैं। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान से हरीश की डिटेल मेडिकल रिपोर्ट मांगी थी। एम्स के विशेषज्ञ डॉक्टरों के बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कर दिया कि हरीश के स्वस्थ होने की अब कोई संभावना बची ही नहीं है। अब इसी रिपोर्ट को आधार मानते हुए अदालत ने माना हौ कि हरीश को और अधिक दर्द में रखना अमानवीय होगा और उनके माता-पिता की ओर से दायर की गई याचिका पर पैसिव यूथेनेशिया को मंजूरी दे दी।
मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग ने 42 साल तक अस्पताल के बिस्तर पर एक मूक जंग लड़ी थी। उनका शरीर तो जिंदा था लेकिन चेतना खत्म हो चुकी थी। अरुणा के लिए इच्छामृत्यु की मांग की गई लेकिन सफलता नहीं मिली। अरुणा की उसी कानूनी लड़ाई ने भारत में ‘पैसिव यूथेनेशिया’ की नींव रखी। अरुणा को उनकी तकलीफ से तो मुक्ति नहीं मिली, लेकिन उनके केस ने हरीश जैसे कई और मरीजों के लिए ‘सम्मान के साथ मरने के अधिकार’ का रास्ता साफ कर दिया। ये रास्ता था पैसिव यूथेनेशिया। आइए अब इसके बारे में जानते हैं-
एक आम नागरिक के लिए यह समझना जरूरी है कि भारत में इच्छामृत्यु का अर्थ किसी की जान लेना नहीं, बल्कि उसे मशीन के सहारे जबरन जिंदा रखने से रोकना है। भारत में इच्छामृत्यु की कानूनी यात्रा 2000 के दशक की शुरुआत में शुरू हुई थी। साल 2005 में विधि आयोग की 196वीं रिपोर्ट ने गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार पर चर्चा शुरू की। इसके बाद 2012 में 241वीं रिपोर्ट में ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ पर दोबारा विचार करने की सिफारिश की गई। एक बड़ा बदलाव मार्च 2018 में ‘कॉमन कॉज बनाम भारत संघ’ के मामले में आया।
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सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ‘पैसिव यूथेनेशिया’ को वैध बनाया और ‘लिविंग विल’ को मान्यता दी। ‘लिविंग विल’ एक ऐसा दस्तावेज है जिसमें कोई व्यक्ति स्वस्थ रहते हुए यह लिख सकता है कि यदि भविष्य में वह ऐसी स्थिति में पहुंच जाए जहां उसका स्वस्थ होना नामुमकिन हो, तो उसे मशीनों यानी लाइफ सपोर्ट के सहारे जिंदा न रखा जाए।
भारत में इच्छामृत्यु प्राप्त करने की प्रक्रिया बहुत जटिल और सुरक्षित है ताकि इसका दुरुपयोग न हो सके। यदि किसी मरीज को पैसिव यूथेनेशिया चाहिए, तो सबसे पहले उसकी ‘लिविंग विल’ देखी जाती है। इसके बाद एक मेडिकल बोर्ड मरीज की शारीरिक और मानसिक स्थिति की जांच करता है।
बोर्ड यह भी देखता है कि क्या वाकई मरीज की स्थिति लाइलाज है और क्या वह असहनीय दर्द झेल रहा है। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के बाद ही कोर्ट की कड़ी निगरानी में लाइफ सपोर्ट सिस्टम (वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब) हटा देने की अनुमति दे दी जाती है।