सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला! अब सरकारी स्कूलों में छात्राओं को मिलेगा मुफ्त सैनिटरी पैड, पॉलिसी बनाने का आदेश
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे अपने यहां उपलब्ध सैनिटरी पैड वितरण और शौचालय सुविधाओं की वर्तमान स्थिति पर हलफनामा दाखिल करें।
- Written By: मनोज आर्या
सुप्रीम कोर्ट, (फाइल फोटो)
Supreme Court On Sanitary Pad: माहवारी स्वच्छता (Menstrual Hygiene) और महिला शिक्षा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम उठाते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक बड़ा और दूरगामी फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि कक्षा 6 से 12 तक की सभी छात्राओं के लिए स्कूलों में मुफ्त सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने हेतु एक ‘राष्ट्रीय नीति’ (National Policy) को तत्काल प्रभावी रूप से लागू किया जाए।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि शिक्षा के अधिकार के साथ-साथ छात्राओं की गरिमा और स्वास्थ्य का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
कोर्ट के फैसले से छात्राओं को राहत
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ मिलकर ‘माहवारी स्वच्छता प्रबंधन’ (MHM) के लिए एक व्यापक योजना तैयार करने का आदेश दिया है। इसके प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं-
सम्बंधित ख़बरें
बिना जुर्म जेल में बिताए 22 साल…सुप्रीम कोर्ट ने जताई कड़ी आपत्ति, ओडिशा हाई कोर्ट को लगाई फटकार
बिहार सरकार का बड़ा फैसला! राज्य में PPP मॉडल पर चलेंगे 16 मेडिकल कॉलेज, 17 प्रस्तावों पर लगी कैबिनेट मुहर
सुप्रीम कोर्ट संशोधन विधेयक 2026 पास, देश को जल्द मिलेगी पहली महिला CJI; सरकार का बड़ा ऐलान
Diplomatic Dispute: अर्जेंटीना के राष्ट्रपति माइली के बिगड़े बोल! ब्राजील के राष्ट्रपति लूला को बोला ‘चोर’
मुफ्त वितरण: सभी सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में छात्राओं को सैनिटरी पैड पूरी तरह से मुफ्त प्रदान किए जाएंगे।
इन्फ्रास्ट्रक्चर पर जोर: कोर्ट ने आदेश दिया कि स्कूलों में केवल पैड देना पर्याप्त नहीं है; इसके लिए छात्राओं के लिए अलग शौचालयों की व्यवस्था और पैड के सुरक्षित निपटान (Disposal) के लिए इंसिनरेटर (Incinerators) की सुविधा भी अनिवार्य होनी चाहिए।
जागरूकता अभियान: स्कूलों में माहवारी से जुड़ी वर्जनाओं (Taboos) को तोड़ने के लिए व्यापक जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया जाए।
फैसले का महत्व और सामाजिक प्रभाव
भारत में एक बड़ा आंकड़ा उन छात्राओं का है जो माहवारी के दिनों में स्कूलों से अनुपस्थित रहती हैं या स्कूल छोड़ देती हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार-
- लगभग 23% लड़कियां माहवारी शुरू होने के बाद स्कूल छोड़ देती हैं।
- उचित सैनिटरी सुविधाओं के अभाव में लाखों छात्राएं हर महीने 4-5 दिन स्कूल नहीं जा पातीं।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल छात्राओं की ड्रॉप-आउट दर (Drop-out Rate) को कम करेगा, बल्कि उन्हें एक स्वस्थ और गरिमामय शैक्षणिक वातावरण भी प्रदान करेगा।
यह भी पढ़ें: ‘माफी की बात पीछे छूटी…’, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने रखी नई मांग, योगी सरकार को दिया 40 दिन का अल्टीमेटम
राज्यों को दी गई डेडलाइन
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे अपने यहां उपलब्ध सैनिटरी पैड वितरण और शौचालय सुविधाओं की वर्तमान स्थिति पर हलफनामा दाखिल करें। केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है कि देश के सबसे दूरदराज के क्षेत्रों में भी इस नीति का क्रियान्वयन हो।
