आखिर सुप्रीम कोर्ट के जज वकीलों को क्यों दी दीवार और काला पत्थर देखने की नसीहत, समझाया हिंदी सिनेमा का महत्व
Supreme Court: जज संजय करोल ने नए श्रम कानूनों को देश के लिए युगांतरकारी बताया है। उन्होंने दीवार और काला पत्थर फिल्म का उदाहरण देते हुए वकीलों को मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ने की नसीहत दी।
- Written By: सजल रघुवंशी
जस्टिस संजय करोल (सोर्स- सोशल मीडिया)
Justice Sanjay Karol Advice To Watch Deewar And Kaala Patthar: सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ जज जस्टिस संजय करोल ने केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए 4 नए श्रम संहिताओं को भारत की श्रम व्यवस्था में एक बड़ा और युगांतरकारी बदलाव बताया है। इसके अलावा जज संजय करोल ने इसे भारत की बिखरी हुई मजदूर प्रणाली को एक समावेसी और सुसंगत ढांचे में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। इसके अलावा जज करोल ने वकीलों को कुछ फिल्में देखने की नसीहत भी दी है।
दरअसल, जस्टिस संजय करोल ने अंबेदकर जयंती के कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि बोलते हुए श्रम सुधारों और डॉ. बी.आर अंबेडकर के योगदान पर विस्तार से चर्चा की। यह कार्यक्रम सुप्रीम कोर्ट की इकाई अधिवक्ता परिषद ने अंबेडकर जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित किया था।
हिंदी सिनेमा में श्रमिक वर्ग की छवि
जस्टिस संजय करोल ने अपने संबोधन में हिंदी सिनेमा की सामाजिक भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि फिल्मों ने लंबे समय तक श्रमिक वर्ग के संघर्ष को मजबूती से सामने रखा। दो बीघा जमीन और नया दौर जैसी फिल्मों ने औद्योगिकीकरण और विस्थापन के डर को संवेदनशील तरीके से चित्रित किया। इन फिल्मों ने समाज को यह सोचने पर मजबूर किया कि विकास की कीमत कौन चुका रहा है।
सम्बंधित ख़बरें
राजा रघुवंशी मर्डर केस: सोनम रघुवंशी की जमानत रद्द, सुप्रीम कोर्ट ने 3 हफ्ते में सरेंडर करने का दिया आदेश
दोपहर तक मेट्रो स्टेशन नहीं खुला तो दखल देंगे, सुप्रीम कोर्ट मेट्रो स्टेशन बंद होने पर CJI का सख्त अल्टीमेटम!
राजा रघुवंशी हत्याकांड: सोनम रघुवंशी की जमानत पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, जेल जाएगी या मिलेगी राहत?
दिल्ली पुलिस के खिलाफ नहीं होगा एक्शन? सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, CJI बोले- समय बर्बाद न करें
संघर्ष और अन्याय की कहानियां
जस्टिस करोल ने दीवार और काला पत्थर का उल्लेख करते हुए कहा कि इन फिल्मों ने मजदूरों के शोषण और असुरक्षित कार्य स्थितियों को मुख्यधारा में लाया। ‘दीवार’ में ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता के साथ धोखा और‘काला पत्थर’में कोयला खदानों की त्रासदी ने श्रमिक जीवन की कठोर सच्चाई को उजागर किया।
बदलता सिनेमा, बदलती प्राथमिकताएं
जस्टिस संजय करोल ने चिंता जताई कि हाल के वर्षों में सिनेमा का फोकस उपभोक्तावाद और पूंजीवादी कथाओं की ओर झुक गया है। इसके कारण श्रमिक वर्ग की कहानियां धीरे-धीरे हाशिए पर चली गई हैं, जो समाज के एक महत्वपूर्ण हिस्से की अनदेखी है।
यह भी पढ़ें: विपक्ष ने महिलाओं को हराया, अंजाम भुगतना होगा…कैबिनेट बैठक में बोले PM मोदी, महिला आरक्षण पर दिया नया टास्क
नई श्रम संहिताएं और वकीलों की भूमिका
जस्टिस करोल ने भारत सरकार द्वारा 21 नवंबर 2025 से लागू चार नई श्रम संहिताओं का उल्लेख किया, जिनमें 29 श्रम कानूनों को समाहित किया गया है। इनका उद्देश्य सामाजिक सुरक्षा बढ़ाना और कार्य परिस्थितियों में सुधार करना है। जस्टिस करोल ने युवा वकीलों से अपील की कि वह इन कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन में सक्रिय भूमिका निभाएं और श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करें।
