जरा याद करो कुर्बानी: अंग्रेजों के सामने नहीं झुके हिलसा के 11 वीर, तिरंगे के लिए सीने पर खाई थीं गोलियां

Quit India Movement: 1942 की अगस्त क्रांति में हिलसा के 11 युवाओं ने अंग्रेजों के खिलाफ तिरंगा फहराने के लिए जान कुर्बान कर दी। आज भी उनका स्मारक उनकी शहादत की कहानी कहता है।
Quit India Movement Hilsa Martyrs
सांकेतिक तस्वीरAI Image
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Quit India Movement Hilsa Martyrs: देश की आजादी के लिए चले स्वतंत्रता संग्राम में बिहार के हिलसा के वीर सपूतों ने भी अदम्य साहस का परिचय दिया था। 1942 की अगस्त क्रांति के दौरान हिलसा के देशभक्त नौजवानों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। उन्होंने हिलसा थाने पर तिरंगा फहराने के लिए जुलूस निकाला, जिसके दौरान अंग्रेज पुलिस की गोलीबारी में 11 नौजवान शहीद हो गए।

आजादी की इस लड़ाई में हिलसा के कई स्वतंत्रता सेनानियों ने जेल की यातनाएं भी सहीं। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान हिलसा में युवाओं के भीतर आजादी का जुनून चरम पर था।

15 अगस्त 1942 को हिलसा थाने पर बोला धावा

11 अगस्त 1942 को पटना में हुए गोलीकांड में शहीद हुए छात्रों की याद में हिलसा के रामबाबू हाई स्कूल मैदान में युवाओं की बैठक हुई। इसी दौरान अंग्रेजी शासन के खिलाफ हिलसा थाने पर प्रदर्शन करने की योजना बनाई गई।

इसके बाद 15 अगस्त 1942 को सैकड़ों देशभक्त नौजवान ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ और इंकलाबी नारों के साथ जुलूस लेकर हिलसा थाने पहुंचे। प्रदर्शनकारियों ने थाने पर तिरंगा फहराने की कोशिश की। इस दौरान अंग्रेज पुलिस ने गोलीबारी कर दी, जिसमें 11 युवा शहीद हो गए और दर्जनों लोग घायल हुए।

चिता पर पड़े थे 12 शरीर, एक युवक की बच गई जान

स्थानीय बुजुर्गों से मिली जानकारी के अनुसार, गोलीकांड के बाद जब भीड़ वहां से हट गई तो थाने के सामने कई घायल और मृत नौजवान पड़े थे। पुलिस ने शवों को एक जगह इकट्ठा किया और उन्हें जलाने के लिए पेट्रोल छिड़क दिया।

इसी दौरान मियां बिगहा गांव के घायल युवक राम बिहारी त्रिवेदी को पेट्रोल की ठंडक से होश आया। वह पानी मांगने लगे। पास के दुकानदार रामचंद्र साहब ने उन्हें पहचान लिया। इसके बाद पुलिसकर्मियों ने उन्हें चिता से अलग कर पानी पिलाया और इलाज के लिए पटना भेजा गया।

होश में आने के बाद राम बिहारी त्रिवेदी ने चिता पर पड़े अपने साथियों को देखा। इसके बाद उन 11 शहीद युवाओं के शवों को आग के हवाले कर दिया गया।

ये 11 वीर सपूत हुए थे शहीद

हिलसा के अगस्त क्रांति आंदोलन में शहीद होने वाले युवाओं में-

  • भीमसेन महतो- इंदौत, उम्र 20 वर्ष

  • सदाशिव महतो- बढ़नपुरा, उम्र 20 वर्ष

  • केवल महतो- बनबारा, उम्र 32 वर्ष

  • सुखारी चौधरी- हिलसा, उम्र 18 वर्ष

  • दुखन राम- गन्नीपुर, उम्र 21 वर्ष

  • रामचरितर दुसाध- बनबारीपुर, उम्र 21 वर्ष

  • शिवजी राम- हिलसा, उम्र 25 वर्ष

  • हरिनंदन सिंह- मलावां, उम्र 19 वर्ष

  • भोला सिंह- बनबारा, उम्र 21 वर्ष

  • बालगोविंद ठाकुर- कछियावां, उम्र 28 वर्ष

  • नारायण पांडेय- कछियावां, उम्र 18 वर्ष

इन युवाओं ने देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

कई स्वतंत्रता सेनानियों को किया गया था गिरफ्तार

उस समय पुलिस ने हिलसा के श्री भगवान सिंह, जमुआरा के सहदेव सिंह समेत कई कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर हाजत में बंद कर दिया था। अगस्त क्रांति के दौरान हिलसा और आसपास के क्षेत्रों में अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन लगातार तेज होता गया था।

आज भी उपेक्षित है शहीदों की स्मृति

देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले इन 11 वीर सपूतों की शहादत की जगह आज भी उपेक्षा का शिकार है। स्थानीय स्तर पर इस ऐतिहासिक स्थल को संरक्षित करने और विकसित करने की मांग लंबे समय से उठती रही है।

Quit India Movement Hilsa Martyrs
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नालंदा जिले के स्वतंत्रता सेनानियों ने भी इस स्थल को संरक्षित कराने के लिए लंबे समय तक प्रयास किए थे, लेकिन उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली। एक छोटा पिरामिडनुमा स्मारक स्तंभ ही इन शहीदों की याद दिलाता है।

हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को स्थानीय लोग यहां पहुंचकर इन वीर सपूतों को श्रद्धांजलि देते हैं। हिलसा के ये 11 गुमनाम नायक आज भी याद दिलाते हैं कि भारत की आजादी सिर्फ बड़े नेताओं के संघर्ष का परिणाम नहीं थी, बल्कि हजारों-लाखों आम भारतीयों ने भी इसके लिए अपना जीवन कुर्बान किया था।

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