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जयंती विशेष: वो महान क्रांतिकारी जिसे आजाद भारत में मिली जिंदा रहने की सजा, भगत सिंह के साथ फांसी पर न चढ़ने का रहा मलाल
आज 18 नवंबर को एक ऐसे महान क्रांतिकारी की जयंती है। जिसने भारत को आजाद कराने के लिए क्रांति की। लेकिन आजाद भारत ने उसे सड़कों की ख़ाक छानने को मजबूर कर दिया। आखिर तक यह कहानी पढ़ेंगे तो आपके भी रोंगटे खड़े हो जाएंगे।
- Written By: अभिषेक सिंह

क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त (सोर्स-सोशल मीडिया)
नवभारत डेस्क: आज यानी सोमवार 18 नवंबर को एक ऐसे महान क्रांतिकारी की जयंती है। जिसने भारत को आजाद कराने के लिए क्रांति की। भगत सिंह के साथ दिल्ली असेंबली में बम फेंका था। जिसे अंग्रेजों ने कालापानी की सजा दी। न जाने कितनी यातनाएं दी। क्रांतिकारी को आजीवन इस बात का अफसोस रहा कि वह भगत के साथ फांसी के फंदे पर क्यों नहीं झूल गया। लेकिन आजाद भारत ने उसे सड़कों की ख़ाक छानने को मजबूर कर दिया। आखिर तक यह कहानी पढ़ेंगे तो आपके भी रोंगटे खड़े हो जाएंगे।
देश आज बटुकेश्वर दत्त की 114वीं जयंती मना रहा है। 18 नवंबर 1910 को बंगाल के पूर्वी बर्दवान के खंडघोष गांव में जन्मे बटुकेश्वर दत्त ने अपनी हाई स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई कानपुर में की, जहां उनकी मुलाकात उनके भावी साथी और कॉमरेड चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह से हुई। बटुकेश्वर दत्त का राजनीतिक सफर यहीं से शुरू हुआ। वह ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’ के सदस्य भी थे। हिंदुस्तान उन्हें असेंबली बम विस्फोट मामले में भगत सिंह के सहयोगी के रूप में याद करता है।
असेंबली बम कांड की मिली सजा
असेंबली में बम फेंकने के मामले में अदालत द्वारा सजा सुनाए जाने के बाद इन लोगों को लाहौर फोर्ट जेल में डाल दिया गया था। गौरतलब है कि साइमन कमीशन का विरोध करते समय लाला लाजपत राय को अंग्रेजों के इशारे पर ब्रिटिश राज के सिपाहियों ने इतनी बुरी तरह पीटा था कि उनकी मौत हो गई थी। क्रांतिकारियों ने इस मौत का बदला ब्रिटिश राज के जिम्मेदार पुलिस अधिकारी की हत्या करके लेने का फैसला किया और उन्होंने ऐसा ही किया। जिसके बाद भगत सिंह पर लाहौर षडयंत्र का आरोप लगाया गया जिसमें उन पर लाहौर के अधीक्षक सैंडर्स की हत्या का आरोप लगाया गया था। इस मामले में उन्हें राजगुरु और सुखदेव के साथ मौत की सजा सुनाई गई थी।
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कालापानी जेल भेजे गए बटुकेश्वर
बटुकेश्वर दत्त को असेंबली बम विस्फोट के जुर्म में कालापानी की सजा काटने के लिए उनके कार्यस्थल से दूर अंडमान की सेलुलर जेल में भेजा गया था। जेल की नारकीय स्थितियों को देखते हुए दत्त ने अन्य साथी कैदियों के साथ बेहतर भोजन, बेहतर इलाज और अन्य सुविधाओं के लिए जेल में भूख हड़ताल शुरू कर दी। तमाम हथकंडे अपनाने के बाद आखिरकार अंग्रेजों को कैदियों के लिए बेहतर भोजन, अखबार और पत्रिकाएं आदि की व्यवस्था करनी पड़ी। 1937 में ही उन्हें सेलुलर जेल से बिहार की पटना जेल में लाया गया और 1938 में रिहा कर दिया गया।
भारत छोड़ो आंदोलन में लिया हिस्सा
कालापानी की सजा के कारण दत्त काफी कमजोर हो गए थे, जिसके बावजूद वे 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में शामिल हो गए। जिसके बाद उन्हें फिर से जेल में डाल दिया गया। आजादी के बाद दत्त को रिहा कर दिया गया। लेकिन इतनी यातनाएं और कठोर सजाएं झेलने के कारण वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गए थे। बटुकेश्वर दत्त देश की आजादी देखने के लिए जीवित रहे लेकिन उनका पूरा जीवन निराशा में बीता।
आजाद भारत में मिली जिंदा रहने की सजा
शायद दत्त को उनके देशवासियों ने इसलिए भुला दिया क्योंकि वे आजादी के बाद भी जीवित रहे। देश की आजादी और जेल से छूटने के बाद दत्त पटना में रहने लगे। पटना में अपनी बस शुरू करने के विचार से जब वे बस परमिट लेने के लिए पटना कमिश्नर से मिले तो कमिश्नर ने उनसे उनके बटुकेश्वर दत्त होने का सबूत मांगा। आजाद भारत में पटना की सड़कों पर भटकने को मजबूर बटुकेश्वर दत्त की पत्नी एक मिडिल स्कूल में काम करती थीं, जिससे उनका गुजारा चलता था।
अंतिम समय में 1964 में अचानक बीमार पड़ने पर उन्हें गंभीर हालत में पटना के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन उनका सही तरीके से इलाज नहीं हो रहा था। इस पर उनके मित्र चमनलाल आजाद ने एक लेख में लिखा था, क्या दत्त जैसे क्रांतिकारी को भारत में जन्म लेना चाहिए, भगवान ने हमारे देश में ऐसे महान योद्धा को जन्म देकर बहुत बड़ी गलती की है। चमनलाल आजाद के मार्मिक लेकिन कड़वे सच को बयां करने वाले लेख को पढ़ने के बाद पंजाब सरकार ने दत्त का इलाज अपने खर्च पर कराने का प्रस्ताव रखा। तब बिहार सरकार ने संज्ञान लिया और उनका इलाज मेडिकल कॉलेज में कराना शुरू किया। लेकिन दत्त की हालत गंभीर हो चुकी थी।
अंतिम समय में क्या बोले बटुकेश्वर
22 नवंबर 1964 को उन्हें दिल्ली लाया गया। दिल्ली पहुंचकर उन्होंने पत्रकारों से कहा, “मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मुझे दिल्ली लाया जाएगा, जहां मैंने बम रखा था, एक अपाहिज की तरह स्ट्रेचर पर।” जब दत्त को दिल्ली के एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया तो पता चला कि उन्हें कैंसर है और उनके जीवन के कुछ ही दिन बचे हैं। यह खबर सुनकर भगत सिंह की मां विद्यावती देवी दत्त से मिलने दिल्ली आईं जो उनके लिए बेटे की तरह थे। जब पंजाब के मुख्यमंत्री रामकिशन दत्त से मिलने पहुंचे और पूछा, हम आपको कुछ देना चाहते हैं, जो भी आपकी इच्छा हो मांग लीजिए।
क्या थी महान क्रांतिकारी की आखिरी ख्वाहिश
आंसू भरी आंखों और पीली मुस्कान के साथ उन्होंने कहा, हमें कुछ नहीं चाहिए। मेरी बस एक ही आखिरी इच्छा है कि मेरा अंतिम संस्कार मेरे दोस्त भगत सिंह की समाधि के बगल में किया जाए। दत्त 20 जुलाई 1965 की रात 1:50 बजे इस दुनिया से विदा हो गये। उनकी इच्छा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार भारत-पाक सीमा के पास हुसैनीवाला में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की समाधि के पास किया गया।
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