

Bankipur Bypoll Result: बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर की जीत को राज्य की राजनीति का बड़ा उलटफेर माना जा रहा है। यह नतीजा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बांकीपुर सीट लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का मजबूत गढ़ मानी जाती रही है और इसका सीधा संबंध भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से जुड़ा है।
नितिन नबीन इस सीट से पांच बार विधायक रह चुके हैं। इससे पहले उनके पिता नबीन किशोर प्रसाद सिन्हा भी इसी विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। ऐसे में इस सीट पर भाजपा की हार को राजनीतिक दृष्टि से बड़ा झटका माना जा रहा है। हालांकि, भारतीय राजनीति में उपचुनावों ने कई बार ऐसे नतीजे दिए हैं, जिन्होंने स्थापित नेताओं और मजबूत राजनीतिक दलों को चौंका दिया। आइए जानते हैं देश के कुछ ऐसे ही चर्चित उपचुनावों के बारे में।
साल 2018 का गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित चुनावी उलटफेरों में गिना जाता है। मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ के इस्तीफे से यह सीट खाली हुई थी। कई दशकों से भाजपा का गढ़ रही इस सीट पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार प्रवीण निषाद ने भाजपा प्रत्याशी उपेंद्र दत्त शुक्ल को हराकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया था।
गोरखपुर के साथ-साथ फूलपुर लोकसभा सीट का परिणाम भी चर्चा का विषय बना था। यह सीट तत्कालीन उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी।
उपचुनाव में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार नागेंद्र प्रताप सिंह पटेल ने भाजपा के कौशलेंद्र सिंह पटेल को लगभग 59 हजार से अधिक मतों के अंतर से हराया था।
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में वर्ष 1971 का मनीराम विधानसभा उपचुनाव आज भी एक ऐतिहासिक घटना माना जाता है। तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिभुवन नारायण सिंह को मुख्यमंत्री बने रहने के लिए विधानसभा का सदस्य बनना आवश्यक था, लेकिन उपचुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। किसी सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री का उपचुनाव हारना भारतीय राजनीति की सबसे असाधारण घटनाओं में शामिल माना जाता है।
उत्तर प्रदेश की घोसी विधानसभा सीट पर वर्ष 2023 में हुए उपचुनाव में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार सुधाकर सिंह ने भाजपा प्रत्याशी दारा सिंह चौहान को पराजित किया था।
दारा सिंह चौहान समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे और उनके इस्तीफे के कारण ही यह उपचुनाव हुआ था। इस नतीजे को विपक्ष की बड़ी जीत और भाजपा के लिए राजनीतिक झटके के तौर पर देखा गया।
बिहार की वैशाली लोकसभा सीट पर 1994 में हुए उपचुनाव ने भी राजनीतिक हलकों को चौंका दिया था। उस समय राज्य के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव थे और उनकी राजनीतिक पकड़ काफी मजबूत मानी जाती थी। इसके बावजूद बिहार पीपुल्स पार्टी की उम्मीदवार लवली आनंद ने जनता दल समर्थित प्रत्याशी को हराकर बड़ा उलटफेर कर दिया था।
बांकीपुर विधानसभा सीट पर प्रशांत किशोर की जीत केवल एक चुनावी सफलता नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे बिहार की बदलती राजनीतिक दिशा का संकेत भी माना जा रहा है। भाजपा के पारंपरिक गढ़ में जन सुराज की जीत ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। हालांकि, इस जीत का व्यापक राजनीतिक असर आगामी विधानसभा चुनावों में ही स्पष्ट होगा, लेकिन इतना तय है कि बांकीपुर उपचुनाव ने बिहार की सियासत में नए समीकरणों को जन्म दे दिया है।