जयंती विशेष: वो नेता जिसने कारसेवकों के लिए ठुकरा दी सीएम की कुर्सी, पढें अध्यापक से हिंदुत्व के नायक बनने की कहानी
Kalyan Singh: मूल रूप से जिले की अतरौली तहसील के गांव मढ़ौली में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे कल्याण सिंह यूपी की राजनीति के शिखर पर पहुंचे। आइए बताते हैं उनके जीवन की कुछ अनकही बातें।
- Written By: अर्पित शुक्ला
नवभारत डेस्क: राममंदिर आंदोलन के सबसे बड़े चेहरे और दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे स्व. कल्याण सिंह का सारा जीवन संघर्षों भरा रहा है। उनकी 93वीं जयंती 5 जनवरी को है। वे दो बार सूबे के मुख्यमंत्री बने, लेकिन देश की राजनीति में हिंदुत्व के नायक का खिताब उनको यूं ही नहीं मिला। न कभी पद पर बने रहने के लिए उसूलों से समझौता किया तथा न राजनीति में उन्होंने कभी सौदा किया। एक इंटर कॉलेज के शिक्षक से लेकर सूबे के मुख्यमंत्री और राज्यपाल तक के संघर्षों भरे सफर की डगर बहुत कांटों भरी रही। जिसके दम पर वो हिंदू हृदय सम्राट तक कहलाए।
मूल रूप से जिले की अतरौली तहसील के गांव मढ़ौली में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे कल्याण सिंह यूपी की राजनीति के शिखर पर पहुंचे। वे बचपन से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखाओं में जाते थे, वे उच्च शिक्षा हासिल कर अतरौली के ही एक इंटर कॉलेज में अध्यापक बने।
कैसा रहा राजनीतिक सफर
1967 में कल्याण सिंह पहली बार अतरौली से विधायक बने तथा 1980 तक लगातार जीते। आपातकाल में 21 महीने तक अलीगढ़ और बनारस की जेल में रहे। जनसंघ से बीजेपी के गठन के बाद प्रदेश संगठन महामंत्री व प्रदेशाध्यक्ष तक बनाए गए। इस दौरान वो गांव-गांव घूमकर भाजपा की जड़ें मजबूत कीं। वर्तमान में विशाल वट वृक्ष बन चुकी इस पार्टी को कल्याण सिंह व उनके सहयोगियों ने ही शुरुआती दिनों में सींचा था, जब देश में बीजेपी का उभार हुआ तो 1991 में प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनी तो वे मुख्यमंत्री बने। कल्याण सिंह के साथ काम कर चुके लोग कहते हैं कि उन्होंने बीजेपी को खड़ा करने में दिन रात एक किया था। आज उसी मेहनत का फल है कि बीजेपी यहां खड़ी है।
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अधूरी रह गई रामलला के दर्शन की इच्छा
लोग बताते हैं कि उन्होंने पद पर बने रहने के लिए कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। इसी का परिणाम है कि अयोध्या में कार सेवकों पर गोली चलवाने से इनकार कर दिया। विवादित ढांचे के विध्वंस की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने सीएम पद को ठोकर मार दी और कहा कि राम मंदिर के लिए एक नहीं सैकड़ों सत्ता कुर्बान हैं।
हालांकि, अयोध्या के निर्माणाधीन मंदिर में विराजमान रामलला के दर्शन करने की उनकी इच्छा अधूरी ही रह गई। 89 साल की उम्र में 21 अगस्त 2021 की देर शाम बीमारी की वजह से उनका लखनऊ में देहांत हो गया।
