नेत्रहीन मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण, खराब कॉर्निया ट्रांसप्लांट कराकर भी देख सकेंगे दुनिया

New Reasearch For Eyes: नेत्रहीनों के लिए वैज्ञानिकों ने नया अविष्कार करते हुए चौंका दिया है।रिसर्च के अनुसार, खराब या पूरी तरह से खराब कॉर्निया का सफलतापूर्वक ट्रांसप्लांटेशन नामक खोज की है।
नई खोज से नेत्रहीनों को मिलेगी रोशनी
नई खोज से नेत्रहीनों को मिलेगी रोशनी (सौ. सोशल मीडिया)
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Eye New Research: कहते हैं जहां पर चाह है वहीं राह भी... नेत्रहीनों के लिए वैज्ञानिकों ने नया अविष्कार करते हुए चौंका दिया है। हाल ही में सामने आई रिसर्च के अनुसार, खराब या पूरी तरह से खराब कॉर्निया का सफलतापूर्वक ट्रांसप्लांटेशन नामक खोज की है। यह खोज नेत्रहीनों के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर आई है। पहले जहां पर हेल्दी कॉर्निया का ट्रांसप्लांटेशन संभंव था वहीं पर अब खराब कॉर्निया भी ट्रांसप्लांटेशन का जरिया बन रहे है। यह कैसे संभंव हो रहा है चलिए जानते है पूरी खबर में।

नई खोज से नेत्रहीनों को मिलेगी रोशनी

यहां पर वैज्ञानिकों ने अपनी हालिया रिसर्च में CALEC (Cultivated Autologous Limbal Epithelial Cells) ट्रांसप्लांटेशन कराकर नेत्र विज्ञान के क्षेत्र में नई दिशा दी है। दरअसल Mass Eye and Ear, Mass General Brigham और Harvard Medical School के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक नई स्टेम-सेल तकनीक विकसित की है। इसके तहत अब मरीज की स्वस्थ आंख से लिम्बल स्टेम सेल विकसित किए जाते है। इन सेल्स को निकालकर लैब में कल्चर कर क्षतिग्रस्त कॉर्निया में ट्रांसप्लांट किया जाता है. इस प्रक्रिया से कॉर्निया के डेड सेल्स हटाकर उसकी संरचना को पुनर्जीवित किया जाता है।

इस नए अविष्कार से जहां पर 3 महीने में 50 प्रतिशत मरीजों की आंखें पूरी तरह से ठीक हुईं। 12 महीने पर यह सफलता 79 प्रतिशत और 18 महीने पर 77 प्रतिशत तक पहुंच गई।कुल मिलाकर 90 प्रतिशत से ज्यादा मरीजों में थोड़ा या पूर्ण सुधार देखने को मिला है।

पहले क्या होता था

बताया जाता है कि, पहले भारत सहित कई देशों में डोनर कॉर्निंया का मिल पाना मुश्किल होता था। यहां पर लगभग 1.2 लाख कॉर्निया ट्रांसप्लांट की ज़रूरत होती है, लेकिन केवल 25,000 ही पूरे हो पाते हैं। इतना ही नहीं पहले खराब कॉर्निया भी किसी तरह से काम का नहीं था लेकिन नई तकनीक से खराब कॉर्निया से भी ट्रांसप्लांटेशन को आसान बनाया है। यह रिसर्च अभी शुरुआती चरण में है और इसे बड़े स्तर पर लागू करने से पहले और क्लिनिकल ट्रायल की ज़रूरत होगी। साथ ही आने वाले 5-7 सालों में इस तकनीक की मदद से आम मरीजों को भी इस तकनीक का फायदा मिलेगा।