Vinod Khanna Death Anniversary: सफलता के शिखर पर पहुंचकर फिल्मों से बनाई दूरी, बर्तन से लेकर आश्रम में साफ करते थे टॉयलेट

70 और 80 के दशक के मशहूर दिग्गज अभिनेता विनोद खन्ना भले ही हमारे बीच आज नहीं है। लेकिन उन्होंने बड़े पर्दे पर खूब राज किया था। फिल्मी पर्दे पर एंट्री लेते ही अभिनेता ने अपने टैलेंट से सभी कलाकारों का पसीना छुड़ा दिया था।
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विनोद खन्ना पुण्यतिथि विशेष (फोटो-सोर्स,सोशल मीडिया)
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मुंबई: विनोद खन्ना हिंदी सिनेमा में एक टॉल, डार्क और हैंडसम हीरो के रूप में जाने जाते रहे हैं। उन्होंने 70 और 80 के दशक अपने अभिनय से दर्शकों के दिलों में खूब राज किया है। वह सिर्फ अपनी बेहतरीन शख्सियत के लिए ही नहीं, बल्कि दमदार अभिनय के लिए भी पहचाने जाते थे। उनके सामने बड़े-बड़े सुपरस्टार भी खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे थे। 'कुर्बानी' से लेकर 'अमर अकबर एंथनी' जैसी हिट फिल्मों ने 70 और 80 के दशक में उन्हें इंडस्ट्री का चमकता सितारा बना दिया था।

दरअसल, 27 अप्रैल 2017 को कैंसर के चलते इस दिग्गज अभिनेता का निधन हो गया, लेकिन उनके शानदार अभिनय की यादें आज भी जिंदा हैं। अपने करियर में विनोद खन्ना ने अमिताभ बच्चन जैसे सुपरस्टार को भी कड़ी टक्कर दी थी। ऐसे में इस खास मौके पर चलिए उनसे जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से जानते हैं...

टॉयलेट साफ करते थे दिग्गज अभिनेता

एक इंटरव्यू में विनोद खन्ना ने खुलासा किया था कि जब वे आध्यात्मिक गुरु ओशो के अमेरिका स्थित आश्रम में रहे, तो वहां वे बगीचे की रखवाली, टॉयलेट साफ करने और खाना बनाने जैसे काम भी करते थे। ओशो और विनोद खन्ना की कद-काठी मिलती थी, इसलिए ओशो के कपड़ों का नाप भी विनोद से लिया जाता था।

उनके बेटे अक्षय खन्ना ने  मीडिया से बातचीत में बताया था कि संन्यास का फैसला उनके पिता के जीवन का सबसे बड़ा बदलाव था। जब अक्षय मात्र पांच साल के थे, तब वे इस फैसले को नहीं समझ पाए थे, लेकिन बड़े होने पर उन्हें इसके मायने समझ में आए।

विनोद खन्ना का करियर

1982 में, अपने करियर के शिखर पर पहुंचकर विनोद खन्ना ने फिल्म इंडस्ट्री से दूरी बना ली और ओशो के शरण में चले गए। आश्रम में वे साधारण काम करते थे, जिससे उनका परिवार भी चौंक गया था। हालांकि, 1987 में फिल्म 'इंसाफ' से उन्होंने बॉलीवुड में वापसी की और फिर एक बार अपनी जगह मजबूत कर ली थी।

सिर्फ अभिनय ही नहीं, विनोद खन्ना ने राजनीति में भी कदम रखा। 1997 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली और 1998 में गुरदासपुर से सांसद चुने गए। बाद में वे केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री भी बने।

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