नहीं रहे राजा सेन... बंगाली सिनेमा के मशहूर निर्देशक ने 71 की उम्र में ली आखिरी सांस

Raja Sen Passes Away: बंगाली सिनेमा के दिग्गज डायरेक्टर राजा सेन का 71 साल की उम्र में कोलकाता में निधन हो गया। वे लंबे समय से गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे।
Raja Sen Passes Away
दिवंगत राजा सेन (फाइल फोटो)
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Raja Sen Bengali Filmmaker Death: भारतीय सिनेमा और खासकर बंगाली फिल्म इंडस्ट्री ने अपना एक अनमोल सितारा खो दिया है। 3 बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित दिग्गज निर्माता-निर्देशक राजा सेन का 16 अगस्त को 71 साल की उम्र में निधन हो गया। कोलकाता के सरकारी अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली।

लंबे समय से स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना कर रहे राजा सेन के जाने से सांस्कृतिक और सिनेमाई जगत में गहरा शोक फैल गया है। उन्होंने अपने करियर में ऐसी कहानियों को बड़े पर्दे पर उतारा, जिन्होंने दर्शकों के दिलों को गहराई से छुआ।

अस्पताल में वेंटिलेटर पर चल रहा था इलाज

राजा सेन की सेहत पिछले कुछ समय से लगातार गिर रही थी। शुरुआत में पीठ के निचले हिस्से में चोट लगने के कारण उन्हें एक प्राइवेट हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। हालांकि, इलाज के दौरान उनकी स्थिति में सुधार नहीं हुआ और दिक्कतें बढ़ती चली गईं।

बाद में उन्हें फेफड़ों और हृदय से जुड़ी गंभीर समस्याएं होने लगीं। स्थिति अधिक बिगड़ने पर उन्हें कोलकाता के एसएसकेएम अस्पताल में स्थानांतरित किया गया, जहां उन्हें किडनी संबंधी परेशानी भी हो गई और वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखना पड़ा।

बच्चन परिवार के साथ काम करने का अनोखा अनुभव

अपने लंबे और सफल करियर के दौरान उन्होंने कई यादगार फीचर फिल्मों, पॉपुलर टेलीविजन सीरियल और विचारोत्तेजक वृत्तचित्रों का निर्माण किया। साल 2002 में आई उनकी चर्चित फिल्म देश में जया बच्चन और अभिषेक बच्चन ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं।

इसके अलावा उन्होंने आत्मीयो स्वजन, देबीपक्ष, कृष्णकांत एर विल, लैबोरेटरी और माया मृदंगा जैसी बेहतरीन फिल्मों का डायरेक्शन भी किया। रवींद्र संगीत की प्रसिद्ध ज्ञाता सुचित्रा मित्रा जैसी महान हस्तियों पर बनाए गए उनके वृत्तचित्रों को भी काफी सराहा गया।

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पहली ही फिल्म से जीता था राष्ट्रीय सम्मान

राजा सेन ने साल 1996 में फिल्म दामु से फीचर फिल्मों के डायरेक्शन की दुनिया में कदम रखा था। अपनी पहली ही फिल्म से उन्होंने अपनी अद्भुत सिनेमाई समझ का परिचय दिया और इस फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम किया।

इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपने कलात्मक दृष्टिकोण से बंगाली सिनेमा को समृद्ध करते रहे। उन्होंने अपने करियर में कुल तीन राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल किए, जो उनकी प्रतिभा का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

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