जब विभाजन ने छीन ली चमक, मरीन ड्राइव के होटल में काम करने को मजबूर हुए प्राण, फिर ‘जिद्दी’ से बदली किस्मत

Pran Struggle Story: विभाजन के बाद प्राण को लाहौर छोड़कर मुंबई आना पड़ा और संघर्ष के दिनों में मरीन ड्राइव के होटल में काम करना पड़ा। 1948 की फिल्म ‘जिद्दी’ ने प्राण की किस्मत बदल दी।
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प्राण (फोटो- सोशल मीडिया)
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Pran Birth Anniversary Special: हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो समय के साथ धुंधले नहीं पड़ते। प्राण कृष्ण सिकंद उन्हीं अमर कलाकारों में से एक थे। 12 फरवरी 1920 को पुरानी दिल्ली के कोटगढ़ बल्लीमारा में जन्मे प्राण ने अपने अभिनय से हर किरदार में ऐसी जान डाली कि दर्शक उन्हें भूल नहीं पाए। नायक हों या खलनायक, कॉमेडियन हों या चरित्र अभिनेता प्राण हर रूप में बेमिसाल साबित हुए।

प्राण के पिता कृष्ण सिकंद सिविल इंजीनियर थे और मां रामेश्वरी गृहिणी। पढ़ाई में तेज प्राण की गणित पर खास पकड़ थी। उनकी शिक्षा देहरादून, कपूरथला, मेरठ, उन्नाव और रामपुर में हुई। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह दिल्ली की एक फोटोग्राफी कंपनी में अप्रेंटिस बने। किस्मत ने उन्हें लाहौर पहुंचाया, जहां हीरा मंडी की एक दुकान पर फिल्म लेखक मोहम्मद वली से मुलाकात ने उनकी जिंदगी बदल दी।

प्राण ने लाहौर में 22 फिल्मों में किया था काम

1940 में दलसुख पंचोली की पंजाबी फिल्म ‘यमला जट्ट’ से प्राण ने बतौर हीरो करियर की शुरुआत की। फिल्म सुपरहिट रही और प्राण रातों-रात स्टार बन गए। 1942 से 1946 के बीच उन्होंने लाहौर में 22 फिल्मों में काम किया और पंजाबी सिनेमा के लोकप्रिय नायक बन गए। लेकिन 1947 का भारत-पाकिस्तान विभाजन उनके जीवन में भूचाल बनकर आया। स्थापित हीरो होने के बावजूद उन्हें सबकुछ छोड़कर मुंबई आना पड़ा।

जिद्दी से मिली प्राण को नई पहचान

मुंबई में नई शुरुआत आसान नहीं थी। लाहौर की पहचान यहां काम नहीं आई। पूरे आठ महीने तक उन्हें कोई काम नहीं मिला। आर्थिक तंगी के बीच उन्होंने मरीन ड्राइव के एक होटल में काम भी किया। आखिरकार लेखक सआदत हसन मंटो और अभिनेता श्याम की मदद से 1948 में बॉम्बे टॉकीज की फिल्म ‘जिद्दी’ मिली। देव आनंद और कामिनी कौशल अभिनीत इस फिल्म में प्राण ने खलनायक की भूमिका निभाई और यहीं से हिंदी सिनेमा को उसका सबसे प्रभावशाली विलेन मिला।

प्राण ने कॉमेडी में भी आजमाया हाथ

इसके बाद ‘मधुमति’, ‘जॉनी मेरा नाम’, ‘जंजीर’, ‘डॉन’ जैसी फिल्मों में उनके नेगेटिव किरदारों ने नई मिसाल कायम की। कहा जाता था “हीरो एक तरफ, प्राण एक तरफ। 360 से अधिक फिल्मों में अभिनय करने वाले प्राण ने कॉमेडी में भी हाथ आजमाया और हर बार सफल रहे। भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्म भूषण (2001) और दादासाहेब फाल्के पुरस्कार (2013) से सम्मानित किया गया। 12 जुलाई 2013 को 93 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।

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