Birthday Special Story: दंगों पर बनी फिल्म ने दिलाया नेशनल अवॉर्ड, रातोंरात चर्चा में आए प्रकाश झा

Prakash Jha Career: प्रकाश झा की डॉक्यूमेंट्री फेसेस आफ्टर द स्टॉर्म उनके करियर का बड़ा टर्निंग प्वाइंट बनी। 1981 के बिहार दंगों पर आधारित इस फिल्म ने उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिलाया।
Prakash Jha Birthday Special Story Faces After the Storm National Film Award Bihar riots 1981
प्रकाश झा (फोटो- सोशल मीडिया)
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Prakash Jha Birthday Special: सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर बेबाक फिल्में बनाने वाले मशहूर फिल्ममेकर Prakash Jha आज बॉलीवुड का जाना-पहचाना नाम हैं। लेकिन उनके करियर की असली शुरुआत एक डॉक्यूमेंट्री से हुई थी, जिसने उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी। यह डॉक्यूमेंट्री थी फेसेस आफ्टर द स्टॉर्म, जिसने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई।

1981 में बिहार के नालंदा जिले में हुए सांप्रदायिक दंगों पर आधारित इस डॉक्यूमेंट्री में प्रकाश झा ने हिंसा के पीछे छिपे सामाजिक और मानवीय कारणों को समझने की कोशिश की। उन्होंने स्थानीय लोगों से बातचीत कर यह जानने का प्रयास किया कि आखिर आम इंसान किस तरह भीड़ का हिस्सा बन जाता है और हिंसा में शामिल हो जाता है। फिल्म ने दिखाया कि दंगों का असर केवल दो समुदायों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज को भीतर तक झकझोर देता है।

प्रकाश झा की फिल्मी दुनिया

उस दौर में प्रकाश झा फिल्मी दुनिया में नए थे। वे मूल रूप से पेंटिंग में रुचि रखते थे और एक कलाकार के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहते थे। लेकिन सामाजिक मुद्दों पर फिल्म बनाने का अवसर मिलने पर उन्होंने इसे पूरी गंभीरता से लिया। सीमित संसाधनों और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने ‘फेस आफ्टर द स्टॉर्म’ को पूरी ईमानदारी से तैयार किया।

प्रकाश झा को मिला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार

इस डॉक्यूमेंट्री को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो उनके करियर का पहला बड़ा टर्निंग प्वाइंट बना। इस सम्मान ने न केवल उन्हें पहचान दिलाई, बल्कि एक गंभीर और संवेदनशील फिल्ममेकर के रूप में स्थापित भी किया। डॉक्यूमेंट्री की सफलता के बाद प्रकाश झा ने फीचर फिल्मों की ओर रुख किया। 1984 में उन्होंने हिप हिप हुर्रे बनाई।

प्रकाश झा का करियर

इसके बाद 'परिणति', 'मृत्युदंड', 'दिल क्या करे', 'गंगाजल', 'अपहरण', 'राजनीति', 'आरक्षण', 'चक्रव्यूह', 'सत्याग्रह', 'जय गंगाजल', 'परीक्षा', 'खोया खोया चांद', और 'लिप्स्टिक अंडर माय बुर्खा' जैसी फिल्मों से उन्होंने सामाजिक-राजनीतिक सिनेमा को नई धार दी। आज प्रकाश झा एक ऐसे फिल्ममेकर के रूप में जाने जाते हैं, जो कठिन और संवेदनशील विषयों को भी साहस के साथ पर्दे पर उतारते हैं। ‘फेस आफ्टर द स्टॉर्म’ सिर्फ उनकी पहली डॉक्यूमेंट्री नहीं थी, बल्कि वही कदम था जिसने उनके लंबे और प्रभावशाली फिल्मी सफर की नींव रखी।

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