Nagabandham Review: 100 करोड़ के बजट और वीएफएक्स भी नहीं बचा सके फिल्म, कमजोर कहानी ने किया निराश
Nagabandham Rating: 'नागाबंधम' बड़े बजट के बावजूद प्रभावित करने में असफल रहती है। कमजोर कहानी, बिखरा स्क्रीनप्ले, लगभग 200 मिनट का लंबा रनटाइम और इमोशनल जुड़ाव की कमी नागाबंधम को बोझिल बना देती है।
- Written By: सोनाली झा
नागाबंधम की कहानी (फोटो सोर्स-सोशल मीडिया)
Nagabandham Movie Review: आज के समय में जब दर्शक सिनेमाघरों में मजबूत कहानी और गहरे जुड़ाव की उम्मीद लेकर जाते हैं, तब निर्देशक अभिषेक नामा की फिल्म ‘नागाबंधम’ यह साबित करती है कि सिर्फ 100 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट और वीएफएक्स की चमक-दमक किसी डूबती नैया को पार नहीं लगा सकती। पौराणिक एडवेंचर के नाम पर बनी यह फिल्म एक बेहद थका देने वाला अनुभव साबित होती है।
फिल्म की कहानी 1756 से 1962 के कालखंड और पौराणिक प्रतीकों (जैसे ब्रह्मा कमल और श्रीरंगपुरम मंदिर के रहस्य) के इर्द-गिर्द बुनी गई है। बुराई पर अच्छाई की जीत और अमरता की तलाश जैसे पुराने फॉर्मूले पर आधारित यह कहानी इतनी बिखरी हुई है कि दर्शक शुरू से अंत तक खुद को इससे जोड़ ही नहीं पाते। स्क्रीनप्ले (पटकथा) में एक के बाद एक आने वाले अंतहीन फ्लैशबैक और ट्विस्ट कहानी को दिलचस्प बनाने के बजाय और उलझा देते हैं।
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरियां
फिल्म का सबसे बड़ा दुश्मन इसका रनटाइम है। लगभग 200 मिनट (3 घंटे से ज्यादा) लंबी यह फिल्म सिनेमा हॉल में दर्शकों के सब्र का कड़ा इम्तिहान लेती है। कहानी में ठहराव की जगह बेवजह के एक्शन सीन और लंबे फ्लैशबैक इसे बेहद उबाऊ बना देते हैं। अगर फिल्म को आधा घंटा छोटा किया जाता, तो शायद यह थोड़ी बेहतर लगती। फिल्म में लाउडनेस और ग्राफिक वायलेंस (क्रूर हिंसा) की भरमार है। हर तरफ कटते सिर, जलते लोग और बहता खून कहानी को आगे बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ सनसनी फैलाने के लिए डाला गया लगता है, जो देखने में काफी अरुचिकर है।
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फिल्म के स्टार कास्ट
फिल्म में रुद्र के रूप में विराट कर्ण ने शारीरिक तौर पर तो मेहनत की है, लेकिन उनके किरदार में कोई इमोशनल गहराई या संवेदनशीलता नहीं दिखती। नभा नटेश और ऐश्वर्या मेनन जैसी अभिनेत्रियों के पास पारंपरिक कपड़ों में सजने-धजने के अलावा करने को कुछ खास नहीं था। जगपति बाबू, मुरली शर्मा और महेश मांजरेकर जैसे शानदार कलाकारों को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया गया है।
खलनायक के रूप में नजर आए ऋषभ साहनी
खलनायक के रूप में ऋषभ साहनी भी कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ पाते। शुरुआत में भव्य सेट और कुछ विजुअल्स भले ही अच्छे लगते हैं, लेकिन जैसे-जैसे फिल्म क्लाइमेक्स की ओर बढ़ती है, वीएफएक्स का स्तर लगातार गिरता जाता है। अंत तक आते-आते यह स्क्रीन पर काफी नकली और ध्यान भटकाने वाला लगने लगता है। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर किसी संगीत की तरह नहीं, बल्कि कानों में चुभने वाले शोर जैसा महसूस होता है।
फिल्म का निष्कर्ष
‘नागाबंधम’ एक ऐसी महत्वाकांक्षी फिल्म है जो केवल अपनी भव्यता के बोझ तले दबकर रह गई है। कमजोर कहानी, लचर निर्देशन और हद से ज्यादा खींची हुई लंबाई के कारण यह फिल्म दर्शकों को सिर्फ सिरदर्द देती है। अगर आप भारी-भरकम शोर-शराबे और बिना सिर-पैर के एक्शन से बचना चाहते हैं, तो इस फिल्म से दूर रहने में ही भलाई है। नागाबंधम को 1.5 स्टार्स मिला है।
