

Shahenshah-e-Ghazal Mehdi Hassan Death Anniversary: मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो, मुझे तुम कभी भी भूला ना सकोगे, ना जाने मुझे क्यों यकीन हो चला है, मेरे प्यार को तुम मिटा ना सकोगे... सुरों के बादशाह और दुनिया भर में गजल के शहंशाह के मशहूर मेहदी हसन की आवाज आज भी लोगों के दिलों में जीवित है। भारत की मिट्टी में जन्मे मेहदी हसन ने पाकिस्तान जाकर जो मुकाम हासिल किया, उसकी मिसाल मिलना तो मुश्किल है।
उनकी पुण्यतिथि के मौके पर लोग अक्सर उनकी जादुई गजलों को याद करते हैं। लेकिन इस आलीशान कामयाबी के पीछे एक ऐसा संघर्ष छिपा हुआ है, जिसे जानकर आम इंसान की भी रूह कांप जाए। एक दौर ऐसा भी था जब सुरों से दुनिया को जीतने वाले मेहदी हसन को दो जून की रोटी भी नसीब नहीं होती थी। जब उनको पेट भरने के लिए साइकिल और गाड़ियों के कल-पुर्जे ठीक करने पड़ते थे।
गजल बादशाह मेहदी हसन का जन्म भारत में राजस्थान के झुंझनू जिले के एक छोटे से गांव लूना में हुआ था। मेहदी हसन का पूरा परिवार संगीत की परंपरा से गहराई से जुड़ा हुआ था। बचपन से ही हसन जी ने अपने पिता और चाचा से संगीत की कड़े अनुशासन वाली शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी। जब वह सिर्फ 18 साल के हुए, तब तक उन्होंने कला में महारत हासिल कर अपनी पहली झलक भी दे दी थी।
हसन जी ध्रुपद और ठुमरी जैसी शास्त्रीय विधाओं में पूरी तरह निपुण हो चुके थे। लेकिन जैसे ही उनका करियर रफ्तार पकड़ने वाला था, तभी बंटवारे का वो साल 1947 में जब देश दो भागों में बंट गया। इस बंटवारे ने लाखों हंसते-खेलते परिवारों को सरहद पार जाने पर मजबूर कर दिया। उन परिवारों में गजल ए बादशाह हसन जी का परिवार भी शामिल था। वह अपने साथ सिर्फ कुछ जरूरी सामान लेकर पाकिस्तान के पंजाब जिले में बस गए, जहां उनको भयानक गरीबी का सामना करना पड़ा।
नया मुल्क नई जिंदगी का सफर...हसन जी के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा था। भुखमरी और कंगाली का वह दौर जब परिवार को पालने के लिए मेहदी हसन ने अपने स्वाभिमान को एक तरफ रख कर पेट भरने के लिए एक साइकिल की दुकान में मैकेनिक का काम करना स्वीकार किया। सुर साधना करने वाले हाथ अब औजारों से गाड़ियों और ट्रैक्टरों की मरम्मत करने में व्यस्त रहने लगे। कमाल की बात यह रही कि इतनी कठिन परिस्थितियों और दिन भर की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद भी उन्होंने कभी संगीत का साथ नहीं छोड़ा। हसन जी रात के अंधेरे में भी लगातार रियाज किया करते थे, क्योंकि उन्हें पूरा भरोसा था कि उनकी कला एक दिन उन्हें इस गरीबी के दलदल से जरूर बाहर निकालेगी।
लगभग 10 सालों के लंबे और थका देने वाले संघर्ष से भरे सफर के बाद साल 1957 में उनकी किस्मत ने करवट बदली। हसन जी को रेडियो पाकिस्तान पर पहली बार अपनी आवाज का जादू बिखेरने का मौका मिला। शुरुआत में उन्होंने ठुमरी गाकर श्रोतागणों को मंत्रमुग्ध कर दिया, लेकिन जब उन्होंने गजल गायकी की तरफ कदम बढ़ाए, तो इतिहास रच दिया।
मेहदी हसन जी की मखमली आवाज सिनेमा जगत के दिग्गजों को इतनी पसंद आई कि वह फिल्मों के लिए अहम गायक बन गए। धीरे-धीरे उनकी ख्याति सरहदों को लांघकर पूरी दुनिया भर में फैल गई। वह अक्सर भारत में भी अपने कार्यक्रम पेश करने आते थे, जहां भारतीय संगीत प्रेमी उन पर जान न्यौछावर कर देते थे।
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मेहदी हसन की गायकी का सम्मान सिर्फ आम लोग ही नहीं बल्कि संगीत की दुनिया के सबसे बड़े नाम भी करते थे। सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर से लेकर जगजीत सिंह और गुलाम अली जैसे दिग्गज कलाकार उनकी गायकी से बेहद प्रभावित थे। एक बार जब भारत में गायिका लता मंगेशकर ने उनके साथ मंच शेयर किया, तो वह उनकी आवाज सुनकर इतनी भावुक हो गईं कि उन्होंने कह दिया कि मेहदी हसन के गले में साक्षात ईश्वर का वास हैं।
कला की इसी सेवा के लिए उन्हें भारत, पाकिस्तान और नेपाल की सरकारों ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से भी नवाजा था। 2 शादियों और 14 बच्चों के बड़े परिवार को संभालने वाले इस गजल गायक ने साल 2012 में दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन हसन साहब की विरासत आज भी अमर है।