Birth Anniversary: कवि प्रदीप की कलम ने रुला दिया था नेहरू से लता मंगेशकर तक, ब्रिटिश सरकार ने लगाया था बैन

Kavi Pradeep Songs: ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ के रचयिता कवि प्रदीप की कलम ने नेहरू से लेकर लता मंगेशकर तक को रुला दिया था। उनके देशभक्ति गीतों से अंग्रेज सरकार डर गई थी और कई गीतों पर प्रतिबंध लगाया गया।
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कवि प्रदीप (फोटो-सोशल मीडिया
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Kavi Pradeep Birth Anniversary: देशभक्ति के उन गीतों की बात हो, जो आज भी हर भारतीय के दिल में गूंजते हैं, और कवि प्रदीप का नाम सबसे ऊपर आता है। 6 फरवरी 1915 को मध्य प्रदेश के बड़नगर में जन्मे कवि प्रदीप ने भारतीय सिनेमा और संगीत जगत में अपनी अमिट छाप छोड़ी। उन्हें विशेष रूप से ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत के लिए याद किया जाता है, जो 1962 के भारत-चीन युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की याद में लिखा गया था।

लखनऊ विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के बाद, कवि प्रदीप मुंबई आए और छोटे नाम के लिए कवि प्रदीप नाम अपनाया। 1939 में एक कवि सम्मेलन में उनकी प्रतिभा को देखकर बॉम्बे टॉकीज ने उन्हें 200 रुपए मासिक वेतन पर काम दिया। यहीं से उनकी छह दशक लंबी रचनात्मक यात्रा शुरू हुई। उन्होंने कुल 71 फिल्मों के लिए लगभग 1700 गीत लिखे, जिनमें देशभक्ति और सामाजिक संदेश प्रमुख थे।

कवि प्रदीप की गीत

उनकी देशभक्ति की झलक कई बार ब्रिटिश प्रशासन को भी खल गई। 1940 में फिल्म ‘बंधन’ का गीत ‘चल चल रे नौजवान’ इतना जोशीला था कि ब्रिटिश सरकार ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया। 1943 में फिल्म ‘किस्मत’ के गीतों के कारण उन्हें भूमिगत होना पड़ा। ब्रिटिश प्रशासन ने उनकी कलम को खतरा मानते हुए निगरानी में रखा।

इस गीत को सुनकर रो पड़ी थीं लता मंगेशकर

‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत की कहानी और भी भावुक है। जब कवि प्रदीप ने यह गीत लता मंगेशकर को सुनाया, तो लता भावुक होकर रो पड़ी थीं। उन्होंने गाने के लिए हामी भरी, लेकिन शर्त रखी कि प्रदीप रिहर्सल में मौजूद रहें। अंततः 26 जनवरी 1963 को नेशनल स्टेडियम, दिल्ली में लता मंगेशकर ने इसे गाया। स्टेडियम में 50,000 से अधिक लोग मौजूद थे, और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आंखों से आंसू बह निकले। नेहरू ने कहा कि जो इस गाने से प्रेरित नहीं हो सकता, वो हिंदुस्तानी नहीं है।

दादासाहेब फाल्के से किया गया था सम्मानित

कवि प्रदीप को 1997 में भारत सरकार से दादासाहेब फाल्के पुरस्कार मिला। हालांकि उनके व्यक्तिगत जीवन में दुख भी कम नहीं थे। पत्नी के निधन के बाद वे लकवाग्रस्त हो गए और उनके चार बच्चों ने उन्हें अकेला छोड़ दिया। कोलकाता के प्रदीप कुंडलिया ने उनकी देखभाल की। कवि प्रदीप का निधन 11 दिसंबर 1998 को हुआ। उनकी याद में 2011 में डाक टिकट जारी किया गया और ‘राष्ट्रीय कवि प्रदीप सम्मान’ की शुरुआत हुई।

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