

The India Story Movie Review: संवेदनशील सामाजिक मुद्दों पर फिल्में बनाना और दर्शकों को जागरूक करना एक सराहनीय कदम है। निर्देशक की फिल्म 'द इंडिया स्टोरी' इसी बात का एक ताजा उदाहरण है। फिल्म कृषि में कीटनाशकों के अनियंत्रित इस्तेमाल और उससे स्वास्थ्य पर पड़ने वाले जानलेवा प्रभावों जैसे गंभीर विषय को उठाने की कोशिश करती है, लेकिन कमजोर पटकथा और ढीले निर्देशन के कारण एक बेहद निराशाजनक अनुभव बनकर रह जाती है। नवभारत इस फिल्म को 2 स्टार्स देता है और इसकी वजह जानने के लिए पढ़ें ये पूरी खबर।
फिल्म की कहानी योगेश यानी श्रेयस तलपड़े के इर्द-गिर्द घूमती है, जो भारतीय सेना में कार्यरत है और अपनी नन्ही बेटी से बेइंतहा प्यार करता है। योगेश की खुशहाल जिंदगी में तब भूचाल आता है जब उसकी बेटी को कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का पता चलता है। इलाज की दर्दनाक प्रक्रिया के दौरान योगेश आर्थिक तंगी से जूझने लगता है।
निराशा और गुस्से के क्षण में वह एक बयान देता है कि देश के किसान और सरकार उसकी बेटी को कैंसर होने के जिम्मेदार हैं, क्योंकि फसलों में हानिकारक कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल हो रहा है और सरकार इस पर कोई ध्यान नहीं दे रही। उसका यह बयान मीडिया में तूल पकड़ लेता है। इसके बाद एक वकील इस मामले को अदालत में ले जाता है, जहां यह बहस छिड़ती है कि कैसे भारत की खराब खाद्य प्रबंधन प्रणाली और मिलावट लोगों के स्वास्थ्य को लील रही है।
फिल्म की सबसे बड़ी और इकलौती राहत श्रेयस तलपड़े का प्रदर्शन है। एक बेबस और अपनी बीमार बेटी के जीवन के लिए संघर्ष कर रहे पिता के रूप में श्रेयस ने अपने किरदार में गहरी इमोशनल संवेदना पिरोई है। एक फौजी के अनुशासन और एक असहाय पिता के दर्द के बीच का संतुलन उन्होंने बेहद खूबसूरती से बनाए रखा है। अस्पताल के दृश्यों में उनकी आंखों की लाचारी दर्शकों के दिल को छूती है। दूसरी ओर, काजल अग्रवाल के पास करने के लिए ज्यादा कुछ खास नहीं था। उनका किरदार बेहद सतही लिखा गया है और वे फिल्म में सिर्फ खानापूर्ति करती नजर आती हैं।
'द इंडिया स्टोरी' का सामाजिक संदेश और मंशा बेशक नेक है, यह फसलों में कीटनाशकों के खतरनाक इस्तेमाल और उससे इंसानी सेहत पर पड़ने वाले बुरे असर के प्रति लोगों को जागरूक करना चाहती है। हालांकि, केवल एक अच्छे विचार के दम पर पूरी फिल्म नहीं खींच सकती। फिल्म की सबसे बड़ी कमी इसकी अचानक और हड़बड़ी में गढ़ी गई पटकथा है, जो दर्शकों को इमोशनल .रूप से जोड़ने में पूरी तरह नाकाम रहती है।
फिल्म का पहला हाफ किसी संवेदनशील ड्रामा के बजाय इतिहास के किसी बोरिंग लेक्चर जैसा महसूस होता है, वहीं दूसरा हाफ थोड़ा शांत जरूर होता है, लेकिन बेहद अनुमानित बना रहता है। कोर्टरूम ड्रामा के दृश्य कई मौकों पर पूरी तरह बेतुके, नीरस और प्रभावहीन नजर आते हैं। कुल मिलाकर, एक बेहद गंभीर और प्रासंगिक मुद्दे को कमजोर निष्पादन ने पूरी तरह बर्बाद कर दिया है, जिससे यह फिल्म बमुश्किल एक बार देखने लायक बन पाती है।