Baby Do Die Do Review: हुमा कुरैशी का अभिनय भी नहीं बचा सका फिल्म, कमजोर स्क्रिप्ट और फीका सस्पेंस पड़ा भारी
Huma Qureshi Film Baby Do Die Do: बेबी डू डाई डू में हुमा कुरैशी ने मूक-बधिर कॉन्ट्रैक्ट किलर के किरदार को प्रभावशाली ढंग से निभाया है, लेकिन फीका सस्पेंस और बिखरी कहानी फिल्म को नुकसान पहुंचाते हैं।
- Written By: सोनाली झा
हुमा कुरैशी की बेबी डू डाई डू (फोटो सोर्स-सोशल मीडिया)
कलाकार: हुमा कुरैशी, चंकी पांडे, सिकंदर खेर, सीमा पाहवा, रचित सिंह
निर्देशक: नचिकेत सामंत
पटकथा: जसमीत के रीन, नचिकेत सामंत, परवेज शेख
रेटिंग्स: 1.5 स्टार्स
Huma Qureshi Film Baby Do Die Do Review: ‘बेबी दो डाई दो’ एक सस्पेंस और डार्क-कॉमेडी थ्रिलर फिल्म है, जिसका निर्देशन नचिकेत सामंत ने किया है। फिल्म की मुख्य ताकत इसकी अनूठी अवधारणा है, जिसमें हुमा कुरैशी एक मूक-बधिर शार्प शूटर और कॉन्ट्रैक्ट किलर की भूमिका में नजर आ रही हैं। फिल्म का शीर्षक मुख्य किरदार ‘बेबी कर्मकार’ के नाम पर आधारित है।
कहानी मुंबई की एक चॉल में रहने वाली बेबी कर्मकार यानी हुमा कुरैशी के इर्द-गिर्द घूमती है, जो बचपन के एक हादसे और अपनी जुड़वां बहन की हत्या के सदमे के बाद एक प्रोफेशनल कॉन्ट्रैक्ट किलर बन जाती है। उसे पापा यानी चंकी पांडे नाम के एक व्यक्ति ने पाला है, जो अंततः उसे एक बड़े बिल्डर और जमीन माफिया जफर भाई यानी सिकंदर खेर के लिए काम पर लगाता है। बेबी अपने शिकार को भीड़-भाड़ वाले इलाकों या लोकल ट्रेनों में एक खास छतरी के जरिए चुपचाप ठिकाने लगा देती है। कहानी में मोड़ तब आता है जब बेबी को अपने संगीत शिक्षक पड़ोसी सिद्धू से प्यार हो जाता है।
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फिल्म का पॉजिटिव पहलू
हुमा कुरैशी का अभिनय: फिल्म को हुमा कुरैशी अपने शांत और संजीदा अभिनय से संभालने की पूरी कोशिश करती हैं। एक मूक-बधिर किरदार के रूप में उनके हाव-भाव और स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म की मुख्य यूएसपी हैं। इसी के साथ तोजो जेवियर की सिनेमैटोग्राफी सराहनीय है। रात के समय मुंबई के नियॉन-लाइट वाले दृश्य, बारिश और चॉल की बनावट फिल्म को एक अलग और स्टाइलिश लुक प्रदान करते हैं।
चंकी पांडे का कॉमिक अंदाज
फिल्म में चंकी पांडे ने अपने पारंपरिक कॉमिक अंदाज से हटकर एक गंभीर भूमिका को बखूबी निभाया है। इसके अलावा, एक चालाक पुलिस अधिकारी के रूप में सीमा पाहवा और खलनायक के रूप में सिकंदर खेर का काम भी अच्छा है। बेबी और सिद्धू के बीच का हल्का-फुल्का रोमांटिक ट्रैक फिल्म के भारीपन को थोड़ा कम करता है।
फिल्म की कमजोर कड़ियां
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी पटकथा है। एक थ्रिलर फिल्म के लिए जो सबसे जरूरी तत्व होता है रहस्य और सस्पेंस, वह यहां बहुत जल्दी उजागर हो जाता है। फिल्म दर्शकों को चौंकाने के बजाय अपने राज बहुत पहले ही खोल देती है। वहीँ दूसरे भाग में कहानी में जरूरत से ज्यादा किरदार और कड़ियाँ जुड़ जाती हैं, जिससे कथानक बिखरा हुआ और अत्यधिक संजोगों पर आधारित लगने लगता है। मुख्य ट्विस्ट और बहन के कातिल का खुलासा अंत में बहुत साधारण तरीके से होता है, जो दर्शकों पर गहरा प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहता है।
फिल्म का निष्कर्ष
‘बेबी दो डाई दो’ एक बेहतरीन और अनूठे विषय के साथ शुरू होती है और हुमा कुरैशी अपनी ईमानदारी से फिल्म को आगे बढ़ाती हैं। लेकिन कमजोर लेखन और सस्पेंस की कमी के कारण यह एक बेहतरीन थ्रिलर बनने के बजाय केवल एक औसत दर्जे की और सतही तौर पर स्टाइलिश फिल्म बनकर रह जाती है। यह उन दर्शकों के लिए एक बार देखने योग्य हो सकती है जो हुमा कुरैशी के अभिनय और डार्क-कॉमेडी शैली को पसंद करते हैं।
