Bashir Badr ने अपनी थीसिस में शामिल किए थे खुद के 87 शेर, दिल छू लेने वाली शायरी से फिल्मों में बनायी पहचान
Bashir Badr Ghazal: बशीर बद्र का 91 साल की उम्र में भोपाल में निधन हो गया। डिमेंशिया से जूझ रहे पद्मश्री सम्मानित शायर ने अपनी सरल और दिल छू लेने वाली गजलों से उर्दू साहित्य को नई पहचान दी।
- Written By: सोनाली झा
बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में निधन (फोटो सोर्स-सोशल मीडिया)
Bashir Badr Passes Away: उर्दू साहित्य और गजल की दुनिया के मशहूर शायर बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में भोपाल में निधन हो गया। उनके निधन की खबर से साहित्य जगत, शायरी प्रेमियों और उनके लाखों प्रशंसकों में शोक की लहर दौड़ गई है। बताया जा रहा है कि बशीर बद्र लंबे समय से डिमेंशिया यानी स्मृतिलोप की बीमारी से जूझ रहे थे। बढ़ती उम्र और बीमारी के कारण उनकी याददाश्त काफी कमजोर हो चुकी थी।
बशीर बद्र का जन्म साल 1935 में उत्तर प्रदेश के अयोध्या में हुआ था। उन्होंने अपनी शायरी में आम जिंदगी के एहसासों, रिश्तों की गर्माहट, मोहब्बत, बिछड़ने के दर्द और इंसानी भावनाओं को बेहद सरल भाषा में पेश किया। उनकी गजलें सिर्फ मुशायरों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि आम लोगों तक पहुंचीं। यही वजह रही कि उनकी शायरी हर वर्ग के लोगों के बीच लोकप्रिय बनी।
बशीर बद्र की शायरी
बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने उर्दू गजल में रोजमर्रा की भाषा और आसान शब्दों का इस्तेमाल किया। उस दौर में पारंपरिक उर्दू शायरी में इस तरह की भाषा कम देखने को मिलती थी। बशीर बद्र ने अपने साहित्यिक सफर में कई चर्चित किताबें लिखीं। इनमें ‘इमकान’, ‘आहटें’, ‘कुल्लियात-ए-बशीर बद्र’ और ‘उजाले अपनी यादों के’ जैसी किताबें शामिल हैं।
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कई मशहूर किताबें लिखी
बशीर बद्र की लिखी कई गजलें और शेर आज भी लोगों की जुबान पर हैं। मुशायरों में उनकी मौजूदगी लोगों को खास तौर पर आकर्षित करती थी। डॉ. बशीर बद्र ने साल 1973 में पीएचडी पूरी की थी। उनका शोध विषय था ‘आजादी के बाद की गजल का तनकीदी मुताला’। यह थीसिस उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में जमा की थी। इस शोध की सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने अपनी थीसिस में अपने ही 87 शेर शामिल किए थे। उस समय तक वह अपनी शायरी के कारण काफी लोकप्रिय हो चुके थे।
बशीर बद्र का करियर
विक्की कौशल की फिल्म मसान में बशीर बद्र का मशहूर शेर कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से इस्तेमाल किया गया था, जिसने दर्शकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी। बशीर बद्र का लिखा मशहूर गीत मुझसे बिछड़ कर खुश रहते हो जगजीत सिंह की दर्दभरी आवाज में अमर हो गया। प्यार, जुदाई और भावनाओं को बेहद सरल शब्दों में पिरोने की कला ने बशीर बद्र को करोड़ों दिलों के करीब पहुंचाया।
पद्मश्री से हुए थे सम्मानित
उर्दू साहित्य और कला जगत में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें साल 1999 में पद्मश्री से सम्मानित किया था। बशीर बद्र ने अपनी नफासत भरी शायरी और संवेदनशील लेखन के जरिए उर्दू साहित्य को नई पहचान दी। उनके निधन से साहित्य जगत ने एक ऐसा शायर खो दिया है, जिसकी गजलें हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेंगी।
