Arshad Warsi Birthday: 14 साल की उम्र में अनाथ हो गए थे अरशद वारसी, फिर कैसे मिला पहला ब्रेक
अभिनेता अरशद वारसी ने एक लंबा सफर तय किया है। अपने बहुमुखी अभिनय के माध्यम से, अरशद वारसी ने उद्योग में एक जगह बनाई है। सेल्समैन से लेकर कोरियोग्राफर तक, अरशद का सफर किसी फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं रहा है।
- Written By: सोनाली झा
अरशद वारसी (फोटो- सोशल मीडिया)
मुंबई: बॉलीवुड के बेहतरीन अभिनेताओं में शुमार अरशद वारसी 19 अप्रैल को अपना 57वां जन्मदिन मनाते हैं। अरशद वारसी जन्म 19 अप्रैल 1968 को हुआ था। उनकी ज़िंदगी की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है। 14 साल की उम्र में माता-पिता को खोने वाले अरशद का जीवन तब पूरी तरह बदल गया था। आर्थिक तंगी ने उन्हें स्कूल छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया और किशोरावस्था में ही उन्हें परिवार के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी उठानी पड़ी।
संघर्ष के दिनों में उन्होंने कॉस्मेटिक उत्पादों की डोर-टू-डोर सेल्समैन के तौर पर शुरुआत की। इसके साथ ही एक फोटो लैब में भी काम किया। लेकिन उनके अंदर छिपा एक कलाकार कभी शांत नहीं हुआ। बचपन से ही डांस के शौकीन अरशद ने खुद को इस कला में मांजना शुरू किया। उन्होंने मशहूर डांसर अकबर सामी के डांस ग्रुप से जुड़कर डांस की दुनिया में कदम रखा और यहीं से उनकी किस्मत पलटी।
अरशद ने कई डांस कॉम्पिटिशन में भाग लिया और 1991 में लंदन में आयोजित डांस चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व किया। वहां से लौटकर उन्होंने अपना खुद का डांस स्टूडियो भी शुरू किया। साल 1993 में फिल्म ‘रूप की रानी चोरों का राजा’ के टाइटल ट्रैक को उन्होंने कोरियोग्राफ किया, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा। कोरियोग्राफी से अभिनय की ओर उनका सफर धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
अरशद ने 1996 में ‘तेरे मेरे सपने’ से बॉलीवुड में बतौर अभिनेता डेब्यू किया। हालांकि, उन्हें असली पहचान 2003 की राजकुमार हिरानी निर्देशित फिल्म ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ से मिली। फिल्म में उनके निभाए गए किरदार ‘सर्किट’ ने उन्हें हर घर में मशहूर कर दिया। उनके सहज अभिनय और हास्यपूर्ण संवाद अदायगी ने दर्शकों के दिल जीत लिए।
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विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘डेढ़ इश्किया’ से वो अपनी इमेज तोड़ने में कामयाब रहे। इसके बाद उन्होंने कई ऐसी फिल्में की जो उन्हें एक शानदार अभिनेता साबित करती है। आज अरशद वारसी एक सफल अभिनेता, कोरियोग्राफर और प्रेरणा के स्रोत हैं। उन्होंने यह साबित कर दिखाया कि यदि हौसला हो तो हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों, मंज़िल जरूर मिलती है।
