बंगाल चुनाव: ममता के गढ़ में भाजपा ने कैसे लगाई सेंध? टीएमसी की हार के वो 5 बड़े कारण, दीदी से कहां चूक हुई?

TMC पश्चिम बंगाल चुनाव के रुझानों ने राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया है। 'खेला होबे' का नारा देने वाली ममता बनर्जी की टीएमसी को बड़ा झटका लगने जा रहा है। जानिए ऐसा क्यों हुआ।
reasons of mamatas loss:
ममता बनर्जी, फोटो- नवभारत डिजाइन
Published on: 
Updated on: 

TMC vs BJP: ममता बनर्जी इस बार अपने ही गढ़ में पिछड़ती नजर आ रही है, जबकि भारतीय जनता पार्टी एक बड़ी बढ़त की ओर अग्रसर है। राजनीतिक विश्लेषकों और शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, ममता बनर्जी की इस संभावित हार के पीछे पांच मुख्य कारण जिम्मेदार माने जा रहे हैं।

किसी भी हार या जीत के पीछे कई कारण होते हैं। जनता का असंतोष और उनकी असहमति अक्सर सत्ता पलट देती हैं। बंगाल में भी कुछ ऐसा ही माहौल देखने को मिल रहा है। अभी तक हुई काउंटिंग में भाजपा ने भारी बढ़त बना रखी है। टीएमसी के इस कदर पिछड़ने के पीछे कुछ ये कारण हो सकते हैं-

भ्रष्टाचार और 'सिंडिकेट राज' के खिलाफ गुस्सा

बंगाल में लंबे समय से 'कट मनी' और 'सिंडिकेट राज' के आरोप टीएमसी सरकार पर लगते रहे हैं। भाजपा ने अपने प्रचार में भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बनाया और जनता को यह समझाने में सफल रही कि केंद्र की योजनाओं का लाभ उन तक न पहुंचने का कारण स्थानीय स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार है। सरकारी नौकरियों में भर्ती घोटाले और पारदर्शी सिस्टम के अभाव ने युवाओं और शिक्षित मध्यम वर्ग को टीएमसी से दूर कर दिया।

'एम-फैक्टर' और ध्रुवीकरण का नया समीकरण

बंगाल की राजनीति में मुस्लिम वोट बैंक हमेशा निर्णायक रहा है। हालांकि, इस बार समीकरण बदलते दिखे। हुमायूं कबीर की पार्टी एजेयूपी (AJUP) और अन्य छोटे दलों ने अल्पसंख्यक वोटों में सेंध लगाई, जिससे टीएमसी का पारंपरिक वोट बैंक कई धड़ों में बंट गया। वहीं दूसरी ओर, सीएए के वादे ने मतुआ समुदाय और सीमावर्ती इलाकों के हिंदू मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में एकजुट कर दिया, जिससे ध्रुवीकरण का सीधा लाभ भाजपा को मिल सका।

बंगाल की जनता को जमा यूपी वाला मॉडल

ममता बनर्जी ने हमेशा 'दीदी' और महिलाओं की रक्षक के रूप में अपनी छवि पेश की, लेकिन संदेशखाली जैसी घटनाओं और राज्य में बढ़ती चुनावी हिंसा ने इस छवि को नुकसान पहुंचाया। भाजपा द्वारा 'यूपी मॉडल' जैसी सख्त कानून-व्यवस्था लागू करने के वादे ने विशेष रूप से शहरी महिलाओं और उन परिवारों को प्रभावित किया जो राज्य में व्याप्त राजनीतिक हिंसा से डरे हुए थे।

'सोनार बांग्ला' बनाम एंटी-इंकंबेंसी भी बड़ा फैक्टर

लगातार सत्ता में रहने के कारण टीएमसी के खिलाफ एक मजबूत 'एंटी-इंकंबेंसी' काम कर रही थी। इसके उलट, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'सोनार बांग्ला' के विजन और औद्योगिक विकास के वादे ने नई उम्मीद जगाई। बंद पड़े उद्योगों को फिर से शुरू करने और रोजगार के लिए पलायन रोकने के वादे ने प्रवासी मजदूरों और युवाओं को भाजपा की ओर खींच लिया।

संगठनात्मक कमजोरी और भाजपा का आक्रामक प्रचार

जमीनी स्तर पर भाजपा का संगठन इस बार पहले से कहीं अधिक मजबूत दिखा। अमित शाह की रणनीति और पीएम मोदी की ताबड़तोड़ रैलियों ने कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भर दी। दूसरी ओर टीएमसी के कई कद्दावर नेताओं का चुनाव से ठीक पहले पार्टी छोड़ना और आंतरिक गुटबाजी ने ममता बनर्जी की पकड़ को कमजोर किया। यदि यही रुझान अंतिम नतीजों में तब्दील हो जाते हैं, तो यह स्पष्ट है कि बंगाल की जनता ने बदलाव और विकास के वादे को तरजीह दी है। सुरक्षा, भ्रष्टाचार मुक्त शासन और सामाजिक समीकरणों के मुद्दे ने इस बार 'दीदी' के किले को ढहाने में खास भूमिका निभाई है।